महाशिवरात्रि के समान कोई पाप नाशक व्रत नहीं :-
धर्मशास्त्र में महाशिवरात्रि व्रत का सर्वाधिक बखान किया गया है। कहा गया है कि महाशिवरात्रि के समान कोई पाप नाशक व्रत नहीं है।इस व्रत को करके मनुष्य अपने सर्वपापों से मुक्त हो जाता है और अनंत फल की प्राप्ति करता है जिससे एक हजार अश्वमेध यज्ञ तथा सौ वापजेय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। इस व्रत को जो 14 वर्ष तक पालन करता है उसके कई पीढ़ियों के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में मोक्ष या शिव के परम धाम शिवलोक की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि व्रत व शिव की पूजा भगवान श्रीराम, राक्षसराज रावण, दक्ष कन्या सति, हिमालय कन्या पार्वती और विष्णु पत्नी महालक्ष्मी ने किया था। जो मनुष्य इस महाशिवरात्रि व्रत के उपवास रहकर जागरण करते हैं उनको शिव सायुज्य के साथ अंत में मोक्ष प्राप्त होता है।
जो मनुष्य इस महाशिवरात्रि व्रत के उपवास रहकर जागरण करते हैं उनको शिव सायुज्य के साथ अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। बेलपत्र चढ़ाने से अमोघ फल की प्राप्ति इस दिन विधि-विधान से शिवलिंग का अभिषेक, भगवान शिव का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करने से सहस्रगुणा अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।
इस बार महाशिवरात्रि पर सभी पुराणों का संयोग :-
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महाशिवरात्रि में तिथि निर्णय में तीन पक्ष हैं। एक तो, चतुर्दशी को प्रदोषव्यापिनी, दूसरा निशितव्यापिनी और तीसरा उभयव्यापिनी, धर्मसिंधु के मुख्य पक्ष निशितव्यापिनी को ग्रहण करने को बताया है।वहीं धर्मसिंधु, पद्मपुराण, स्कंदपुराण में निशितव्यापिनी की महत्ता बतायी गयी है, जबकि लिंग पुराण में प्रदोषव्यापिनी चतुर्दशी की महत्ता बतायी है, जो इस बार महाशिवरात्रि पर सभी पुराणों का संयोग है।
महाशिवरात्रि व्रत के बारे में लिंग पुराण में कहा गया है
कि प्रदोष व्यापिनी ग्राह्या शिवरात्र चतुर्दशी'-
रात्रिजागरणं यस्यात तस्मातां समूपोषयेत'
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अर्थात महाशिवरात्रि फाल्गुन चतुर्दशी को प्रदोष व्यापिनी लेना चाहिए।रात्रि में जागरण किया जाता है। इस कारण प्रदोष व्यापिनी ही उचित होता है।
|| शिव शक्ति जी की जय हो ||