Translate

Friday, 9 October 2026

नवम भाव का स्वामी दशम भाव में...

 




*नवम भाव का स्वामी- दशम भाव में*


*भाग्येश दशमस्थे तु लोकवन्द्यो गुणी नरः।*


*भूपस्तत्सदृशोऽमात्यः सेनाध्यक्षोऽथवा भवेत् ।।*


*होरारत्न में कहा है कि नवमेश दशमस्थ हो तो मनुष्य गुणवान् लोकपूज्य राजा अथवा तत्सदृश मन्त्री या सेनाध्यक्ष होता है।*


*भाग्येश दशम भाव में हो तो जातक राजा का कार्य करने वाला, राजा से लाभ करने वाला, अच्छे कार्य में आसक्त, माता का अविघ्नकारी और प्रसिद्ध एवं धर्मिक होता है*


*नवमेश दशम में हो तो राजकीय मान सम्मान प्राप्ति व धुरन्धर राजकारणी*


*लोमेश संहिताः*


*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् ।* 


*पुण्यवान्पशुमांश्चापि साहसी क्रोधवर्जितः ।।*


*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम और चतुर्थ भाव में बैठा हो वह मनुष्य मन्त्री या सेनापति होता है। तथा पुण्यवान्, पशुओं को रखने वाला, साहसी और क्रोध से रहित होता है*


*पराशरः*


*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत्।* 


*पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः।।*


*भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति,. पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है*


*मानसागरीः*


*नृपकर्माणं शूरं माता-पित्रोश्च पूजकं पुरुषम् ।* 

*धर्मख्यातं कुरुते सुकृतपतिर्गगनगृहशीलः ।।* 


*नवमेश दशम भाव में हो तो जातक राज कर्मचारी, शूर, माता-पिता का भक्त और धर्मात्मा होता है* 


*यवन जातकः*


*नृपतिकर्मकरो नृपवित्तयुक्सुकृतकर्मकरो जननीपरः । विदितकर्मकरः सुकृताधिपो गगनगे पुरुषो भवति ध्रुवम् ॥*


*जिसके धर्मपति दशम भवन में हो वह पुरुष राजा का कर्म करनेवाला और राजा के धन से युक्त हो तथा श्रेष्ठ कर्म और माता की सेवा में तत्पर विख्यात कर्म करनेवाला होता है*


*भृगु संहिताः*


*धर्मनाथे गते कर्मे भातापित्रोश्च पूजकः ।*

 

*राजमानी प्रियामुक्तः राजद्वारा धनागमः ॥*


*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम स्थान में हों वह मनुष्य माता और पिता की सेवा करने वाला, राजमानी, प्रिया से युक्त और राजद्वार से धन की प्राप्ति करने वाला होता है*


*जातक निर्णय* 


*यदि नवमेश दशम भाव में हो तो जातक काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली होता है। वह उदार होगा और अधिकार वाले पद पर होगा। वह काफी धन अर्जित करेगा और हर प्रकार का आराम प्राप्त करेगा। उसके जीवन यापन का साधन उचित मार्ग होगा और वह कानून का पालन करने वाला नागरिक होगा*


*ज्योतिस्तत्त्वम् :*


*शेशे ऽन्वये सुकृतकर्मकरो नृपस्व-*

*भुग् भूपकर्मकरणोद्यत एप शूरः ।*

*सत्कीर्त्तिमान् सुविदितः पुरुषः सुशास्त्र-*

*विन्मातृवर्गविजयी पितृमातृभक्तः ॥*


*दशम में नवमेश होतो पुण्यकर्म करने वाला राजधन का उपभोग करने वाला, राजकार्य करने में उद्यत, शूरवीर उत्तम कीर्ति वाला, प्रसिद्ध, शास्त्र वेत्ता, मातृ वर्ग में विजय पाने वाला एवं माता पिता का भक्त होता है*


*मानाथभे मातृ‌निकेतने ऽथ वा मार्गाधिनाथे सुकृती च साहसी ।*


*क्रोधोज्झितः कीर्त्तियुतश्चमूपतिर्वाग्ग्मी प्रजातः सचिवः कलेवरी ॥*


*दशम वा चतुर्थ में नवमेश हो तो पुण्यात्मा, साहसी, क्रोध रहित, यशस्वी, सेनापति, शास्त्र सम्मत बोलने बाला एवं मंत्री होता है*


*नवाथेजी-यह भाग्यवान, कीर्तिमान, सफल, पुण्यकार्य करनेवाला तथा धर्मनिष्ठ होगा*


*हमारे विचार-उपर्युक्त फलों में बहुत भाई होना यह फल भाग्येश पापग्रह होकर पुरुष राशि में हो तो अनुभव में नहीं आता। अन्य फल शनि को छोड कर अन्य ग्रहों के बारे में ठीक प्रतीत होते हैं*


                              (2)

*यह तो था जो की शास्त्रों में बताया गया है*

*अब आप ध्यान से पढ़ें  समझें और फिर विचार करें कि.......*


*नवम भाव हमारे भाग्य का भाव है अर्थात पुर्व जन्म कृत कर्मों का फल जो हमें इस जन्म में किए जा रहे कर्म में कुछ सहुलियत प्रदान करता है।*

*भाग्येश यहां कर्म क्षेत्र में बाधा भी उत्पन्न कर सकता है क्यों कि दशम में उसका द्वादशेष है।*


*नवमेश दशम में होगा तो वह योगकारी बन जाएगा क्योंकि त्रिकोण का स्वामी केंद्र में आ गया है।*


*और अपने भाव से द्वि द्वादश का सम्बन्ध बना लेगा।*


*अर्थात धन दायक तो होगा लेकिन व्ययकारक भी हो जाएगा।*


*एक हाथ ले एक हाथ दे।*

*भाग्य पती कर्म भाव में होगा तो वह लाभ के साथ साथ अवरोध भी पैदा कर देगा।*


*क्यों कि भाग्य से ज्यादा मिलना मुश्किल है।*


*अर्थात कर्म जितना मर्जी कर ले , लेकिन अगर भाग्य में ही नहीं लिखा तो कहां से मिल जाएगा।*


*इसलिए मानसिक*


 *तनाव का कारण बन सकता है।*


*लेकिन भाग्य अनुकूल हुआ तो कम काम से भी अधिक लाभ मिल सकता है।*


*ग्रह की युति दृष्टि के कारण कुछ अधिक प्राप्त हो भी सकता है, लेकिन भाग्येश होने के कारण वह सब संचित जा भी सकता है।*


*इसीलिए यहां ज्यादा भाग्य के भरोसे न रह कर कर्म पर ही विश्वास रखना चाहिए।*


*क्यों कि यह भाव कालपुरूष की कुंडली में कर्म के स्वामी शनि का भाव है।*


*अतः इस भाव में भाग्य तभी चमकेगा जब कर्म के साथ साथ सात्विकता अर्थात धर्म परायणता हो,*


*चोरी चकारी अथवा गैर कानूनी कार्य न हो।*


*क्यों कि यह राज क्षेत्र है तो यहां गैरकानूनी ढंग से किए गए कार्य से राजदंड मिलना भी तय है।*


*और यहां का राजदंड देता है शनि , कर्म फल दाता शनि, और वह फल अपने दो चेलों राहु केतु के माध्यम से देगा।*


*अर्थात राहु केतु दंड देंगे और अन्य ग्रह उससे बचने के लिए या उसके अनुसार कर्म में लग जाएंगे।*


*मजे की बात यहां स्वयं शनि भी उनके द्वारा निर्धारित दंड को भोगेगा।*

*अर्थात यह सब ग्रह मिलकर जातक के उत्थान और पतन दोनों के लिए कार्य करेंगे।*


*बचेगा वही जो ग्रहानुसार कर्म करेगा।*


*मकर का  मैदान है तो संघर्ष तो रहेगा ही रहेगा चाहे स्वयं ईश्वर ही क्यों न हों लीला रूप में ,जीव रूप में*


*नवमेश दशमस्थ हो तो ऐसा जातक कर्म स्थल पर बहुत ज्यादा धर्म पारायण हो सकता है।*


*लेकिन वह वैसी धर्म पारायणता स्वयं के लिए नहीं समझता।*


*वह कोई न कोई मार्ग अलग से जरूर निकाल लेगा ताकि धर्म पारायणता भी रह जाए और काम भी हो जाए।*


*उदाहरणार्थ*

*उदाहरण कुछ अलग हो सकता है फिर भी इससे भाव को समझा जा सकता है।*


*भगवान कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन के हाथों कई योद्धाओं का अनैतिक तरीके से या नियमों की अवहेलना करते हुए वध करवा दिया।*


*जैसे भीष्म, कर्ण, भीम के हाथों दुर्योधन इत्यादि।*


*लेकिन वहीं बात अपने पर न आए उसके लिए धर्म पारायण तर्क भी रख दिया कि उन योद्धाओं ने कौन सा नियमों का पालन किया था।*


*कहने का तात्पर्य यह कि नवमेश दशमस्थ हो तो जातक अगर कोई अनैतिक कार्य*


 *भी करता*

 *है तो उसके पीछे नैतिक तर्क जरूर रख देगा।*


*लेकिन ऐसा नहीं है कि वह अनैतिक कर्म फल से भाग जाएगा या बच कर निकल जाएगा,*


*मकर राशि में उसके सारे कर्म रिकॉर्ड हो जाएंगे और उसे उसका भुगतान अगले जन्म में तो क्या इसी जन्म में भी करना होगा।*


*उसका वर्तमान का परिवार वर्तमान के सारे मिलने जुलने वाले उसके कर्म अनुसार या तो देकर जाएंगे नहीं तो लेकर तो जाएंगे ही।*


*आज कल भी प्रायः देखने को मिल ही जाता है, अनैतिक ढंग से कमाया धन , देर सवेर किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।*


*इसे आप कर्ज अदायगी या फर्ज अदायगी भी कह सकते हैं।*


*क्यों कि अग्नि त्रिकोण, धर्म त्रिकोण हमारी फर्ज अदायगी भी है।*



*वैदिक ज्योतिष में जब नवम भाव का स्वामी (भाग्येश) दशम भाव (कर्म भाव) में स्थित होता है, तो यह अत्यंत शुभ और शक्तिशाली राजयोग बनाता है, जिसे धर्म-कर्माधिपति राजयोग कहा जाता है मुख्य प्रभाव और फल कर्म ही भाग्य बनता है: नवम भाव भाग्य का है और दशम भाव कर्म का। जब भाग्य का स्वामी कर्म स्थान में जाता है, तो जातक की मेहनत और ईमानदारी ही उसके भाग्य का सबसे बड़ा निर्माण करती है। व्यक्ति जो काम करता है, वही उसकी पहचान और पूजा बन जाती है।*


*नवम भाव विदेश, या दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राओं और नए अनुभवों का भाव माना जाता है। जब इसका स्वामी दशम भाव में आता है, तब जातक को विदेश या दूरस्थ क्षेत्रों में जाने का अवसर या दूर स्थानों पर काम करने के मौके मिलते हैं*


*ऐसे लोग अकसर विदेश या दूरस्थ क्षेत्रों में पढ़ाई, नौकरी या बिज़नेस के ज़रिए अपने करियर को नई ऊँचाई देते हैं। अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो यह योग व्यक्ति को ग्लोबल एक्सपोज़र, नए कॉन्टैक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला सकता है*



*जब नवम भाव का स्वामी दशम भाव में आता है, तब यह स्थिति जीवन में कर्म और भाग्य का शक्तिशाली मेल बनाती है। ऐसे जातक अपने क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते हैं फिर चाहे वह नौकरी हो, प्रशासनिक सेवा, राजनीति या स्वयं का व्यवसाय ,भाग्य यहाँ कर्म के साथ खड़ा रहता है, जिससे सफलता सहज और स्थायी बन जाती है।*


*यह योग अक्सर राजयोग तुल्य फल देता है — व्यक्ति को उच्च पद, प्रतिष्ठा और समाज में पहचान दिलाता है। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में “role model” की तरह माने जाते हैं, क्योंकि उनका जीवन यह संदेश देता है कि “भाग्य उन्हीं का साथ देता है, जो कर्म में आस्था रखते हैं*


*अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो जातक को सम्मान, पदोन्नति और लोक-मान्यता मिलती है। लेकिन अगर ग्रह अशुभ प्रभाव में हो, तो उन्नति में विलंब या बार-बार बाधाएँ आ सकती हैं। फिर भी, यह स्थिति इतना मजबूत संयोग है कि व्यक्ति अंततः अपने परिश्रम और आस्था से आगे निकल ही जाता है*




*काम और धर्म values का connection*


*ऐसा profession पसंद आता है जिसमें knowledge, advice, management, law, finance, teaching, astrology, administration या public dealing शामिल हो।*



*नवमेश दशम में हों तो व्यक्ति की  अपने “काम”को ही अपनी पूजा-पाठ यानि अपना कर्म और धर्म बना लेना चाहिए फिर देखें की क्या बनता है।*


*“भाग्य भी career में ही लगाना है और career को ही अपना भाग्य बनाना है!”*


*आज के लिए इतना ही काफी बाकी  बातें फिर कभी..........*


*राम राम जी*


*Astropawankv*

         *Let The Star's Guide You*


*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223. www.astropawankv.com*

Saturday, 26 September 2026

पितृ ऋण दोष

 




*ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को पूर्वजों की अतृप्ति, ऋण अथवा उनके प्रति दायित्वों की अनदेखी से उत्पन्न एक प्रमुख दोष माना गया है*


*हर कुंडली में शनि की स्थिति को सीधे “पितृदोष” कहना शास्त्रीय रूप से उचित नहीं है।* 


*शनि पितृऋण, कर्म, वंशपरंपरा, पूर्वजों से जुड़े दायित्व और विलंब का संकेतक होता है, लेकिन* *वास्तविक पितृदोष का निर्णय सूर्य, नवम भाव, नवमेश, राहु-केतु, शनि, पितृकारक ग्रह तथा दशा या गोचर को समग्र रूप से देखकर करना चाहिए।*


*पितृदोष और पितृऋण में अंतर है*

*यह distinction बहुत महत्वपूर्ण है*


*पितृऋण*

*वंश और पूर्वजों के प्रति दायित्व।*


*पितृदोष*

*कुंडली में ऐसे ग्रह-संबंधों की पारंपरिक ज्योतिषीय व्याख्या जिनसे ancestral/paternal karma में बाधा मानी जाती है।*


*इसलिए हर व्यक्ति किसी न किसी अर्थ में पितृऋण से जुड़ा है।*


*लेकिन हर व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष नहीं होता।*


*सबसे पहले समझते है* *“पितृदोष”* *वास्तव में क्या है?*


*वैदिक दृष्टि से पितृऋण का अर्थ केवल कोई दोष या शाप नहीं है*


*मनुष्य तीन प्रमुख ऋणों की अवधारणा से जुड़ा माना गया है*


*देव ऋण → ऋषि ऋण → पितृ ऋण*


*पितृऋण का भाव है*


*“जिस वंश, संस्कार, शरीर और सामाजिक आधार से हमें जीवन मिला, उसके प्रति कृतज्ञता और अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह।”*


*इसलिए पितृदोष को केवल डराने वाले अर्थ में देखना उचित नहीं*


*ज्योतिष में जब वंश, पिता, पूर्वज, पारिवारिक परंपरा, संतान, कर्म और नवम भाव से संबंधित अनेक संकेत एक साथ पीड़ित हों, तब पितृदोष या पितृऋण की चर्चा अधिक सार्थक होती है।*


*अब समझते है पितृदोष में सूर्य को प्राथमिकता क्यों?*


*सूर्य के प्रमुख कारकत्व हैं पिता + आत्मा + वंश + अधिकार + प्रतिष्ठा + पूर्वजों की पुरुष परंपरा।*


*इसलिए पितृदोष का विश्लेषण करते समय पहले देखें*


*सूर्य की स्थिति*


*सूर्य किस भाव में है?*


*किस राशि में है?*


*सूर्य पर शनि की दृष्टि है?*


*राहु और केतु से संबंध है?*


*सूर्य नवमेश से जुड़ा है?*


*सूर्य नवम भाव से संबंधित है?*

*सूर्य की नवांश स्थिति कैसी है?*

*सूर्य की दशा/अंतरदशा चल रही है?*

*फिर शनि की भूमिका देखें।*


*नवम भाव — पितृ और धर्म का मुख्य द्वार*


*नवम भाव = धर्म + गुरु + भाग्य + पिता + पूर्व पुण्य + ancestral values*


*इसलिए पितृदोष की चर्चा में नवम भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है*


 *सबसे पहले विशेष रूप से यह देखें कि*


*नवम भाव + नवमेश + सूर्य + शनि + राहु/केतु*

*यदि इनका परस्पर संबंध बन रहा है तो पितृ-संबंधी कर्मफल का विषय अधिक महत्वपूर्ण होता है*


*आपको किन उपायों से बचना चाहिए?*


*सिर्फ यह सुनकर कि*

*“कुंडली में शनि है, इसलिए पितृदोष है।”*

*तुरंत महंगी पूजा, रत्न, विशेष अनुष्ठान या डर पैदा करने वाले उपाय करवाना बिलकुल भी उचित नहीं।*


*सबसे पहले देखें*


*लग्न → सूर्य → नवम भाव → नवमेश → शनि → राहु/केतु → पंचम → अष्टम → दशा → गोचर*


 *इन सभी का गहराई से अध्ययन करने के बाद*

*फिर निष्कर्ष निकाले*


*पितृपक्ष हमें डराने के लिए नहीं, जोड़ने के लिए है।*


*सूर्य बताता है कि “मैं किस वंश से आया हूँ।”*


*नवम भाव बताता है कि *“मुझे कौन से संस्कार मिले।”*


*पंचम भाव बताता है कि *“मैं क्या आगे छोड़कर जाऊँगा।”*


*अष्टम भाव बताता है कि *“वंश में क्या गहराई से छिपा है।”*


*शनि पूछता है  *कि “इन सबके प्रति मेरी जिम्मेदारी क्या है?”*


*इसलिए पितृदोष की सबसे सुंदर व्याख्या केवल “पूर्वजों का दोष”*नहीं बल्कि “वंश से प्राप्त कर्म, संस्कार और दायित्व को समझकर उसे अगले स्तर पर सुधारने का अवसर।”*


*और इसी कारण शनि का सर्वोच्च उपाय केवल पूजा नहीं बल्कि कर्म, सेवा, अनुशासन, वृद्धों का सम्मान और अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता है।*



*“पितृदोष का अर्थ केवल पूर्वजों का शाप नहीं, कभी-कभी वह हमारी कुंडली में दिखाई देने वाला वह कर्म-संदेश है, जो कहता है जिस वंश ने तुम्हें जन्म दिया, उसके अधूरे दायित्वों को समझो, सुधारो और अगली पीढ़ी को बेहतर विरासत दो।”*



*“शनि को प्रसन्न करने का सबसे बड़ा उपाय शनि से संबंधित वस्तु का दान नहीं, बल्कि शनि के सिद्धांतों का जीवन में पालन है न्याय, श्रम, अनुशासन, सेवा, धैर्य और जिम्मेदारी।”*


*लोग ये सब नहीं करते, फिर बोलते है*

*मैने क्या किया है* 

*मैने क्या किया है*



*आज के लिए इतना ही काफी बाकी फिर कभी.....*




             *(2)*



*ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष को पूर्वजों की अतृप्ति, ऋण अथवा उनके प्रति दायित्वों की अनदेखी से उत्पन्न एक प्रमुख दोष माना गया है*

*पराशर होरा शास्त्र एवं अन्य फलित ग्रंथों के अनुसार, कुंडली में सूर्य (पिता/पूर्वज के कारक), गुरु (संस्कार व धर्म के कारक), नवम भाव (भाग्य व पितृ भाव) और पंचम भाव (संतान व पूर्वपुण्य भाव) की स्थिति से इस दोष का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है*



*​कुंडली में पितृ दोष की पहचान करने के मुख्य ज्योतिषीय सूत्र:*


*​1. नवम भाव और नवमेश की स्थिति (पितृ भाव)*


*​राहु/केतु का प्रभाव: नवम भाव में राहु या केतु स्थित हों अथवा नवम भाव का स्वामी (नवमेश) राहु/केतु के साथ युति बना रहा हो*


*​त्रिक भावों में नवमेश: नवमेश 6ठे, 8वें या 12वें भाव में दुर्बल होकर पाप ग्रहों (शनि, राहु, मंगल) से पीड़ित या दृष्ट हो*

*​पापकर्तरी योग: नवम भाव के दोनों तरफ पाप ग्रह स्थित हों (अष्टम और दशम में), जिससे पितृ भाव कमजोर हो जाए*

*​2. सूर्य की स्थिति (पितृ कारक ग्रह)*

*​सूर्य-राहु/केतु युति (ग्रहण योग): सूर्य के साथ राहु या केतु का किसी भी भाव में स्थित होना प्रत्यक्ष पितृ ऋण अथवा पितृ दोष को दर्शाता है*


*​सूर्य-शनि युति: सूर्य और शनि का एक ही भाव में होना या समसप्तक दृष्टि होना पिता-पुत्र संबंधों में तनाव तथा पूर्वज बाधा का सूचक बनता है*


*​नीचस्थ सूर्य: सूर्य तुला राशि में नीच का होकर त्रिक भावों (6, 8, 12) में स्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो*

*​3. पंचम भाव और गुरु की स्थिति (संतान व गुरु ऋण)*

*​संतान बाधा योग: पंचम भाव में सूर्य-राहु, शनि-राहु या केवल राहु की स्थिति होने से वंश वृद्धि और संतान सुख में अड़चन आती है, जो पितृ असंतोष का लक्षण है*


*​गुरु चांडाल योग: देवगुरु बृहस्पति (धर्म व आशीर्वाद के कारक) के साथ राहु की युति*

 *पंचम या नवम भाव में होना।*

*​पंचमेश की स्थिति: पंचम भाव का स्वामी 6ठे, 8वें या 12वें भाव में राहु से आक्रांत हो*


*​4. अष्टम व दशम भाव से संबंध*

*​अष्टम भाव (अदृश्य बाधाएं): यदि अष्टमेश और नवमेश का राशि परिवर्तन हो या अष्टम भाव में सूर्य-राहु की युति हो, तो यह कुल-परंपरा में अचानक आने वाले संकट और पितरों की अतृप्ति को दर्शाता है*


*​दशम भाव (पितृ कर्म): दशम भाव पर राहु/शनि का क्रूर प्रभाव पूर्वजों के प्रति किए जाने वाले उत्तरदायित्वों की कमी को दर्शाता है*

*​प्रमुख लक्षण*

*​परिवार में वंश वृद्धि (संतान प्राप्ति) में बार-बार बाधाएं या विलंब होना।*

*​घर में अकारण कलह, अशांति और सदस्यों में लगातार बीमारी रहना।*

*​बनते हुए कार्यों में ऐन वक्त पर रुकावट आना और आर्थिक तंगी का बने रहना*

*​स्वप्न में बार-बार मृत पूर्वजों का दिखना या जल, सांप व श्मशान के दृश्य दिखाई देना*

​

*आज के लिए इतना ही बाकी फिर कभी......*


*राम राम जी*


*Astropawankv*

             *Let The Star's Guide You*


*Scientific Astrology & Vastu ...... Astro. Research Centre Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223. www.astropawankv.com*

Friday, 4 September 2026

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व

 



*श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व*

      


*प्रत्येक वर्ष पूरे देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान  श्री कृष्ण जी के बाल स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रात के समय रोहिणी नक्षत्र में यशोदा नंदन जी का जन्म हुआ था। प्रत्येक वर्ष इसी दिन कान्हा जी का जन्मोत्सव भव्य तरीके से मनाया जाता है। खासतौर से देश के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी के पावन अवसर पर खास तैयारियां की जाती हैं। इस दिन कान्हा जी का विशेष साज-श्रृंगार किया जाता है। इतना ही नहीं बाल गोपाल जी को (56) छप्पन तरह  के भोग लगाए जाते हैं। वहीं कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिर और घरों में लड्डू गोपाल की भव्य झांकियां भी लगाई जाती हैं*


*धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्णजी का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था इसलिए निशिता काल में बाल गोपाल जी की पूजा करना खास माना जाता है। तो इस मुहूर्त में सबसे पहले बाल गोपाल जी को स्वच्छ जल,दूध,दही, शहद,गंगाजल पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद लड्डू गोपाल बाल गोपाल श्री कृष्ण जी को नए वस्त्र और आभूषण पहनाकर उनका श्रृंगार करें। अब कान्हा जी को चंदन का तिलक लगाएं और फूल अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर कृष्ण जी की आरती करें और उन्हें माखन-मिश्री समेत अन्य भोग लगाएं। श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी अनिवार्य होता है तो भोग और पूजा में तुलसी जरूर रखें*


*श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल भगवान श्री कृष्ण  जी को इन चीजों का भोग अवश्य लगाएं*।


*1-माखन-मिश्री 2-पंचामृत 3-खीर*

      *4-दही 5-फल 6-पंजीरी,7  घर पर बनी मिठाई*


  || *हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की* ||



*श्री कृष्णा गोविंद हरे मुरारी* 

*हे नाथ नारायण वासुदेवा* 


*वसुदेव सुतं देवं कंशचाणूरमर्दनम्।*

*देवकी परमानंदं कृष्णं वंदे जगद्गुरूम्।।*



*नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की*

*हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की*


*जगत के पालनहार भगवान श्री हरि नारायण के परम अवतार, योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी के प्राकट्योत्सव के पावन पर्व पर आप सभी जन को Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं*

                

*जय श्री कृष्णा*  


*राधे राधे जी*

 *जय श्री कृष्ण भगवान जी की* 


*Astropawankv*

*Let The Star's Guide You*

*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223. www.astropawankv.com*