Translate

Wednesday, 6 May 2026

ज्योतिष शास्त्र (वैदिक) पितृ ऋण दोष




 *ज्योतिष शास्त्र (वैदिक) में पित्रादि-दोष (ऋण) या श्राप की सही पहचान और निदान।*


*"पित्र-श्राप" का सही पता सिर्फ जन्म कुण्डली देखकर ही नहीं लगाया जा सकता है, अपितु कुंंडली ना होने पर इसके अलावा प्रश्न कुंडली, हस्त-रेखा (सामुद्रिक विज्ञान),  अपराविज्ञान और शकुन शास्त्र के माध्यम से भी "पित्र दोष" का सही पता लगाया जा सकता है, परन्तु प्राय ये विधिंयाँ प्रचलन में नहीं है लुप्तप्राय सी हो गयी हैं।*

मुख्य रूप से जन्म कुण्डली से ही पित्र दोष का निर्णय किया जाता है। 

        चार प्रकार के प्रवल पित्र-दोष :- 

              

*सूर्य.... आत्मा एवं पिता का कारक गृह है पित्र पक्ष का विचार सूर्य से होता है।*  


*"चन्द्रमा" मन एवं माता पक्ष का कारक ग्रह है।* 


*मंगल...  हमारे रक्त , जीन्स, परम्परा, पौरुष और बंधुत्व पक्ष का कारक ग्रह है।*


*शुक्र.... भी हमारे भोग, ऐश्वर्य और स्त्री पक्ष का कारक ग्रह है।*


सूर्य जब राहु- की युति में हो तो ग्रहण योग बनता है, सूर्य का ग्रहण अतः पिता या आत्मा का ग्रहण हुआ यानि पित्र-श्राप या श्रापित आत्मा। और चंद्र केतु की युति, अमावस्या दोष या चंद्र ग्रहण दोष भी एक प्रकार का पित्र दोष ही होता है 

      *चार अत्यंत कष्टकर पित्र-दोष :-*

 "सूर्य"---- सूर्य राहू सूर्य शनी या सूर्य केतु की युति पित्र दोष का निर्माण करती है।


 "चन्द्र"--- अगर राहू, केतुु , शनी या सूर्य की युति  ग्रहण में हो तो पित्र दोष (मातृ पक्ष) होता है। 


"मंगल"--- भी यदि पूर्णास्त है या इन क्रूर ग्रहों से युक्त है तो भी वंशानुगत पित्र दोष होता है।


"शुक्र"--- या सप्तम भाव यदि सूर्य, मंगल, शनी या राहु से युक्त हो तो भी स्त्री पक्ष से पित्र श्राप बनता है।

*वैसे समस्त ग्रहों के दूषित होने से कुंंडली में विभिन्न प्रकार के अन्य पित्रादि श्राप भी बन सकते हैं.... परंतु अभी हम कुछ प्रमुख पित्र दोषों (श्रापों) को समझने की कोशिश करते  हैं :-*

शनि सूर्य पुत्र है, यह सूर्य का नैसर्गिक शत्रु भी है, अतः शनि की सूर्य पर दर्ष्टि भी पित्र दोष उत्पन करती है। इसी पित्र दोष से जातक आदि-व्याधि-उपाधि तीनो प्रकार की पीड़ाओं से कष्ट उठाता है, उसके प्रत्येक कार्ये में अड़चनें आती रहती हैं, कोई भी कार्य सामान्य रूप से निर्विघ्न सम्पन्न नहीं होते है, दूसरे की दृष्टि में जातक सुखी-सम्पंन दिखाई तो पड़ता है, परन्तु जातक आंतरिक रूप से दुखी होता रहता है, जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है, कष्ट किस प्रकार के होते है इसका विचार व निर्णय सूर्य राहु की युति अथवा सूर्य शनि की दृष्टि सम्बन्ध या युति जिस भाव में हो उसी पर निर्भर करता है, कुंडली में चतुर्थ भाव नवम भाव, तथा दशम भाव में सूर्य राहु अथवा चन्द्र राहु की युति से जो पित्र दोष उतपन्न होता उसे श्रापित पितृ दोष कहते है, इसी प्रकार पंचम भाव में राहु गुरु की युति से बना गुरु चांडाल योग भी प्रबल पितृ दोष कारक होता होता है, संतान भाव में इस दोष के कारण प्रसव कष्टकारक होते हैं, आठवे या बारहवे भाव में स्थित गुरु प्रेतात्मा से पित्र दोष करता है, यदि इन भावो में राहु बुध की युति में हो तथा सप्तम, अष्टम भाव में राहु और शुक्र की युति में हो तब भी पूर्वजो के दोष से पित्र दोष होता है, यदि राहु शुक्र की युति द्वादश भाव में हो तो पित्र दोष स्त्री जातक से होता है इसका कारण भी स्पष्ट कर दें क्योंकि बारहवाँ भाव भोग एव शैया सुख का स्थान है, अतः इस भावके दूषित होने से स्त्री जातक से दोष (श्राप) होना स्वभाविक है ये अनैतिक संबंधों का कारण भी हो सकता है।

          *अन्य श्रापित योग :-*

अगर कुण्डली में  अष्टमेश राहु के नक्षत्र में तथा राहु अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित हो तथा लग्नेश निर्वल एवं पीड़ित हो तो जातक पित्र दोष एव भूत प्रेतादि आदि से शीघ्र प्रभावित होते हैं।


अगर जातक का जन्म सूर्य चन्द्र ग्रहण में हो तथा घटित होने वाले ग्रहण का सम्बन्ध जातक के लग्न, षष्ट एव अष्टम भाव से बन रहा हो तो ऐसे जातक पित्र दोष,भूत प्रेत, एव आत्माओं के प्रभाव से पीड़ित रहते हैं।


 अगर लग्नेश जन्म कुण्डली में अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो तथा राहु , शनि, मंगल के प्रभाव से युक्त हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत्माओं का शिकार होता है।


अगर जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम भाव तथा पंचमेश अष्टम भाव में स्थित हो तथा चतुर्थेश षष्ठ भाव में स्थित हो और लग्न या लग्नेश पापकर्तरी (प्रतिबंधक) योग में स्थित हो तो जातक मातृ श्राप एवं अतृप्त मात्र आत्माओं से प्रभावित होता है।


 अगर चन्द्रमा जन्म कुण्डली अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो या चन्द्र एव लग्नेश का सम्बन्ध क्रूर एव पाप ग्रहो से बन रहा हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत-वाधा, एवं 

पित्रात्माओं से प्रभावित होता है।


 अगर कुंडली में शनि एव चन्द्रमा की युति हो अथवा चन्द्रमा शनि के नक्षत्र में, अथवा शनि चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थित हो तो जातक पित्र दोष,  एव अतृप्त आत्माओं से शीघ्र प्रभावित होता है।


अगर लग्नेश जन्म कुंडली में अपनी शत्रु राशि में निर्बल आव दूषित होकर स्थित हो तथा क्रूर एव पाप ग्रहो से युक्त हो तथा शुभ ग्रहो की दृष्टि लग्न भाव एव लग्नेश पर नहीं पड़ रही हो, तो जातक प्रेतात्माओं, एव पित्र दोष से पीड़ित होता है।


अगर जातक का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी के मध्य हुआ हो और चन्द्रमा अस्त, निर्बल, एव दूषित हो, अथवा चन्द्रमा पक्षबल में निर्बल हो, तथा राहु शनि से युक्त नक्षत्र परिवर्तन योग बना रहा हो तो श्राप के कारण जातक अदृश्य रूप से मानसिक बाधाऔं का शिकार होता है।


अगर कुंडली में चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में स्थित हो तथा अन्य क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव चन्द्रमा, लग्नेश, एव लग्न भाव पर हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से प्रभावित होता है।


अगर कुंडली में गुरु का सम्बन्ध राहु से हो तथा लग्नेश एव लग्न भाव पापकर्तरी योग में हो तो जातक को अतृप्त आत्माए अधिक परेशान करती है ।


अगर बुध एव राहु में नक्षत्रीय परिवर्तन हो तथा लग्नेश निर्बल होकर अष्टम भाव में स्थित हो साथ ही लग्न एव लग्नेश पर क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से परेशान रहता है और मनोरोगी बन जाता है।


अगर कुंडली में अष्टमेश लग्न में स्थित हो (मेष लग्न को छोडकर अन्य लग्नों में) तथा लग्न भाव तथा लग्नेश पर अन्य क्रूर तथा पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृपत आत्माओं का शिकार होता है।


अगर जन्म कुण्डली में राहु जिस राशि में स्थित हो उसका स्वामी निर्बल एव पीड़ित होकर अष्टम भाव में स्थित हो तथा लग्न एव लग्नेश पापकर्तरी योग में स्थित हो तो जातक ऊपरी हवा, प्रेत बाधित और आत्माओं से परेशान रहता है ।


*ऐसे और भी बहुत से ग्रह योग जन्म कुंडली में होते हैं जिन्हें गहराई से अध्ययन अवलोकन करने पर बहुत कुछ जाना जा सकता है*

            ************

 *सिर्फ इतना ही नहीं और भी दूषित ग्रहों से पित्र-ऋण (श्राप) दोष भी बनते हैं जो जीवन में बहुत ही अवरोध पैदा करके नाना प्रकार के कष्ट देते हैं :-* 

           जैसे:-

*पित्र दोष(श्राप) के कारण व प्रकार*

     1- "सूर्य" से पिता, चाचा, ताऊ, दादा, परदादा, नाना, मामा, मौसा या समतुल्य पैत्रिक (पित्रपुरुस) ऋण (श्राप)।

    2-"चंद्र" से मातृ, मातृ पक्ष या मात्तुल्य स्त्रियों के ऋण (श्राप)।

     3-"मंगल" से भाई, मित्र, स्नेही या इनके समान पित्रों का ऋण (श्राप)।

    4-"बुध" से बहन-भांजी बुआ, साली, ननद या समतुल्य का ऋण (श्राप)।

    5-"गुरू" से गुरुदेव, ब्राह्मण, महात्मा, ज्ञानीजन, शिक्षक, विद्वान, पंडित या कुल पूज्य पुरुस आदि का  ऋण (श्राप)।

     6-"शुक्र" से पत्नी, प्रेमिका अथवा शैया सुख देने वाली अन्य स्त्रियों का ऋण (श्राप)।।

     7-"शनी" से सेवक, कर्मचारी, मातहत, वेटर, मजदूर, मिश्त्री, चांडाल (डोम), भिकारी, या दीन-दुखियों का ऋण (श्राप)।।

    8-"राहु-केतु" से प्राकृतिक, पर्यावरण, सामाजिक, क्षेत्रपाल, देश, मात्रभूमी, सरकारी अधिकारी, कर चोरी, जाने-अन्जाने की गई हिंसा, जीवहत्या या अनैतिक व्यवहार व व्यापार के अभिश्राप (ऋण)।।

           **********

*हस्त-रेखा से भी:-* 

*भिन्न-भिन्न ग्रह पर्वतों के योग एवं पर्वतों पर पाऐ जाने वाले चिन्ह जैसे:- क्रोस, जाल, द्वीप, वलय, भंग, दाग (तिलादि), झाँई, या अन्य अशुभ चिन्हों से भी सभी प्रकार के पित्रादि दोषों (श्रापों) बीमारी को सहजता से जाना जा सकता है।*

            ************


पितृ दोष (श्राप) भी भांति भांति के पाऐ जाते हैं, इन्ही पित्रादि दोषो के कारण जातक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, अकस्मात दुर्घटनाओं से परेशान रहता है, और शनै-शनै जातक का जीवन नर्क बनता जाता है, एवं कई बार तो दिखने में सम्पंन व्यक्ती भी आंतरिक तौर से पीडित होकर मृतकों जैसा जीवन जीने पर मजबूर हो सकता है और दोष की सही जानकारी ना होने पर श्रापमुक्ती के लिऐ दर-दर भटकता रहता है व तमाम तंत्र, मंत्र, रत्न , व्रत, जाप या उपाय करके भी पीडित दुःखी रहता है उसको कोई लाभ नहीं होता अन्ततः वैदिक तंत्र-ज्योतिषादि को ही ढ़ोंग मान बैठता है।।

        ***********

       *तब  करें क्या:-*

   एक बात ध्यान दें कि मौत के बिना हर बीमारी का इलाज है मगर मौत का कोई ईलाज नहीं हर एक श्राप, दोष, दुर्भाग्य, और पाप का प्रायश्चित कर्म-विधान व उसको करने का सही स्थान और मुहुर्त भी हमारे वैदिक शास्त्रों में बताया है एवं अत्यंत फलदायी भी होता है ये अकाट्य सत्य है वर्तमान कर्मों से ... भविष्य का लेख भी बदल सकता है।।

*अतः जिस तरह पित्रादि-दोष (श्राप) या ऋण कई प्रकार के होते हैं.....   उसी तरह इनके निदान (प्रायश्चित कर्म-विधान) भी देश, काल, परिस्थितियों के आधीन होकर विभिन्न तरीके से ही कराना उचित होता है।*

       *इसलिऐ सर्वप्रथम जातक को... इस विषय के विषेशज्ञ व तत्वज्ञ ज्योतिषाचार्य से उचित  परामर्श लेना चाहिये और तत्पश्चात उसके द्वारा बताऐ गये " मुहुर्त" में ..... पूर्ण श्रद्धा और समर्पण भाव से इन श्रापों (दोषों) का प्रायश्चित कर्म-विधान करवाना चाहिऐ.... तथा आचार्यों द्वारा बताऐ गये नियम-संयमों का पूर्ण विश्वास से पालन करना करें... फिर आप देखेंगे ये दोष भी आपकी उन्नती में मील के पत्थर बन जायेंगे... शुभास्तु।।*

🙏🙏


*Astropawankv*

         *Let The Star's Guide You*

*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 www.astropawankv.com*



Tuesday, 14 April 2026

आत्मविश्वास का मंत्र

 *आत्मविश्वास का मंत्र*



*जामवंत जी ने हनुमान जी से ऐसा क्या कहा था जो आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ा 'आत्मविश्वास का मंत्र' है?*


*रात के 2 बजे हैं। कमरे में सन्नाटा है, बस घड़ी की टिक-टिक गूंज रही है। नींद कोसों दूर है और सीने में एक अजीब सी धक-धक महसूस हो रही है। सामने एक ऐसा पहाड़ खड़ा है—चाहे वह कोई बेहद अहम परीक्षा हो, जीवन का कोई बड़ा संकट हो, कोई टूटता हुआ रिश्ता हो, या ज़िंदगी का कोई ऐसा मोड़ जहाँ आगे के सारे रास्ते धुंधले नज़र आ रहे हों। उस पल, अंदर से एक ही चीख उठती है...*


*"यार, ये मुझसे नहीं होगा।"*


*हम सबने इस पल को जिया है। उस घुटन को महसूस किया है जब लगता है कि हम अपनी ही उम्मीदों के बोझ तले दब गए हैं।*


*बचपन में जब हम अंधेरे से डरते थे या किसी बात से घबराते थे, तो घर के बड़े-बुज़ुर्ग हमें जीवन-सुधार की कोई 500 पन्नों की भारी-भरकम किताब नहीं थमाते थे। वे बस प्यार से सिर पर हाथ फेरते और कहते, "हनुमान जी का नाम ले लो, सब ठीक हो जाएगा।" बड़े हुए, तो विज्ञान पढ़ा। हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसना शुरू किया। युवा मन सोचने लगा कि भला कुछ शब्द दोहराने से क्या पहाड़ कट जाएंगे? या समंदर पार हो जाएंगे?*


*लेकिन जैसे-जैसे ज़िंदगी के असली समंदर सामने आए और लहरों ने थपेड़े मारे, तब समझ में आया कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और कथाओं के आवरण में मानव मन का कितना गहरा विज्ञान छिपा कर रखा था। वे केवल कहानियां नहीं कह रहे थे; वे हमारे अवचेतन मन को भीतर से मज़बूत कर रहे थे।*


*आज, 'भारतीय विरासत' की इस यात्रा में, हम किसी अंधविश्वास की नहीं, बल्कि उस गहरे दर्शन की बात करेंगे जो रामचरितमानस की एक चौपाई में छिपा है। एक ऐसी चौपाई जो दुनिया का सबसे बड़ा 'आत्मविश्वास का मंत्र' और निराशा को चीरने वाली 'संजीवनी' है।*


*वह शाम, जब हनुमान जी को उनका 'ईश्वरीय' रूप याद आया*


*एक दृश्य की कल्पना कीजिए।*


*भारत का दक्षिणी छोर। सामने मीलों तक फैला, गर्जना करता हुआ अनंत समुद्र। लहरें इतनी ऊँची मानो आसमान को निगल जाना चाहती हों। तट पर वानर सेना हताश और निराश बैठी है। सीता जी की खोज का समय समाप्त हो रहा है और लंका तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं है।*


*सेना के सबसे वीर योद्धा—अंगद, नल, नील—सब अपनी-अपनी क्षमताओं का आकलन कर रहे हैं। कोई कहता है "मैं जा तो सकता हूँ, पर वापस आने की ऊर्जा नहीं बचेगी।" हर किसी के मन में गहरा संदेह है।*


*और इन सबके बीच, शोर से दूर, एक चट्टान पर चुपचाप हनुमान जी बैठे हैं। सिर झुका हुआ है वे बिल्कुल मौन हैं अपनी ही शक्तियों से अनजान।*


*उन्हें अपनी क्षमताओं का कोई अंदाज़ा नहीं है। बचपन के एक श्राप के कारण वे भूल चुके हैं कि वे पवनपुत्र हैं। तब पूरी सेना के सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी जामवंत जी उनके पास जाते हैं। जामवंत जी उन्हें कोई जादुई जड़ी-बूटी नहीं देते। वे उन्हें कोई नया अस्त्र-शस्त्र नहीं थमाते। वे बस उनके पास जाते हैं और एक ऐसा वाक्य कहते हैं, जो इतिहास का सबसे शक्तिशाली मार्गदर्शन बन जाता है:*


*कवन सो काज कठिन जग माहीं।*


*जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥*


*(अर्थ: हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो तुमसे न हो सके? तुम तो राम के कार्य के लिए ही अवतरित हुए हो।)*


*ज़रा ठहर कर सोचिए... क्या जामवंत जी ने हनुमान जी को कुछ नया दिया था? नहीं न। उन्होंने सिर्फ वह याद दिलाया जो पहले से उनके भीतर था।*


*हम अपनी शक्तियां क्यों भूल जाते हैं?*


*हनुमान जी को बचपन में ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे अपनी शक्तियां भूल जाएंगे, और जब कोई उन्हें याद दिलाएगा, तभी वे वापस आएंगी।*


*अगर हम इस कथा को आज के तर्क के चश्मे से देखें, तो क्या यह श्राप हम सब पर नहीं लगा है?*


*हम सबका श्राप है—अपनी सोई हुई शक्तियों को भूल जाना। जब हम बच्चे होते हैं, तो हमें लगता है कि हम दुनिया बदल सकते हैं। फिर हम बड़े होते हैं। बार-बार मिलने वाली असफलताओं पर दूसरों की टिप्पणियां और हमारा अपना डर ही हमारे दिमाग पर एक पर्दा डाल देता है। हम मान लेते हैं कि हम बस 'साधारण' हैं। हम अपनी ही बनाई हुई सीमाओं के जाल में फँस जाते हैं।*


*मानव स्वभाव में उस स्थिति को 'मान ली गई हार' कहते हैं। जब इंसान बार-बार हारता है तो वह मान लेता है कि जीतना असंभव है, भले ही परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी हो। हनुमान जी तट पर उसी लाचारी का शिकार होकर बैठे थे।*


*जामवंत: मन को साधने वाले पहले गुरु*


*जब जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा—"कवन सो काज कठिन जग माहीं", तो वे मस्तिष्क को साधने की सबसे प्राचीन विद्या का प्रयोग कर रहे थे।*


*जब आप घबराहट में होते हैं और कहते हैं "मुझसे नहीं होगा", तो आपका मस्तिष्क तुरंत उन कारणों की पूरी सूची खोल देता है कि आप क्यों असफल होंगे। लेकिन जब आप खुद से या कोई सच्चा गुरु आपसे कहता है, "ऐसा क्या है जो तुम नहीं कर सकते?", तो मस्तिष्क का ध्यान तुरंत 'समस्या' से हटकर 'समाधान' पर चला जाता है।*


*इस चौपाई का एक-एक शब्द विज्ञान है:*


* *कवन सो काज : यह आपके मस्तिष्क को चुनौती देता है।*


* *कठिन जग माहीं : यह स्वीकार करता है कि दुनिया में चुनौतियां हैं, लेकिन वे असंभव नहीं हैं।*


* *जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं : यह सीधे आपके मन की गहराइयों में असीम आत्मविश्वास का बीज बो देता है।*


*जैसे ही हनुमान जी ने ये शब्द सुने, उनका आत्म-संशय टूट गया। उनके भीतर का वह पर्वत जाग उठा जो सो रहा था। और जब वे जागे, तो उनका स्वरूप कुछ ऐसा था।*


*मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।*


*वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥*


*(अर्थ: जो मन के समान तेज़ हैं, वायु के समान वेगवान हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं... मैं उन श्रीरामदूत की शरण में हूँ।)*


*यह श्लोक बताता है कि जब आप अपने भीतर के संदेह को मिटा देते हैं, तो आपका वेग 'मन' के समान तेज़ हो जाता है। आप जो सोचते हैं, उसे यथार्थ में बदल सकते हैं।*


*आज की पीढ़ी इसका उपयोग कैसे करे?*


*आज हमारे सामने लंका जाने का समुद्र नहीं है। हमारे समुद्र हैं—बेरोजगारी का डर, नए व्यापार के डूबने की चिंता, गहरी उदासी और रिश्तों की उलझनें।*


*जब भी आपको लगे कि आप हार रहे हैं, जब बेचैनी आपको घेर ले और पसीने छूटने लगें, तो फोन पर दूसरों के प्रेरक विचार खोजने के बजाय, एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करें...*


*लंबी सांस लें। और खुद के लिए 'जामवंत' बन जाएं। खुद से कहें—"कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥" इसे सिर्फ एक धार्मिक मंत्र की तरह नहीं, बल्कि मन को साधने वाले एक अचूक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करें। यह खुद को आदेश देने की सबसे शक्तिशाली तकनीक है। जब आप इसे बार-बार दोहराते हैं, तो* *आपका मस्तिष्क डर के पुराने रास्तों को छोड़कर, जीत और आत्मविश्वास की नई दिशाएँ तय करने लगता है।*


*आप देखेंगे कि जो पहाड़ कल तक अजेय लग रहा था, आज वह बस एक सीढ़ी नज़र आ रहा है।*




*हमारे पूर्वज जानते थे कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन बाहर नहीं, उसके अपने दिमाग के भीतर बैठा डर है। और उस डर को हराने के लिए उन्होंने हमें ये मंत्र, ये चौपाइयां एक धरोहर के रूप में दीं।*


*वह समुद्र जो हनुमान जी के सामने था, वह केवल खारे पानी का विस्तार नहीं था; वह हमारे और आपके भीतर बैठे 'संदेह' का समुद्र था। और उसे पार करने के लिए किसी बाहरी पुल की आवश्यकता नहीं थी, वह पुल हमारे अपने आत्मविश्वास का था।*


*अगली बार जब दुनिया आपसे कहे या आपका अपना मन आपसे कहे कि* *"तुमसे नहीं होगा", तो मुस्कुराइयेगा। क्योंकि आप उस संस्कृति के वारिस हैं, जहाँ हनुमान जी ने सिर्फ एक वाक्य सुनकर सूरज को फल समझ लिया था और समंदर को एक छलांग में लांघ दिया था।*


*आपके भीतर भी वही राम-काज करने वाली ऊर्जा सो रही है। बस उसे जगाने की देर है!*


 *हमेशा याद रखें कि*

*हर दुःख  हम सभी को एक सबक देता है और हर सबक इंसान को बदल देता है।*



       *सबसे पहले आप सभी जन खुद से प्यार करें,*

*फिर शांत  चित्त होकर बैठें फिर अपने अपने ईष्ट देवी देवता अपने अपने गुरू महाराज जी और परम पिता परमेश्वर परमात्मा जी का ध्यान करते हुए प्रार्थना करते रहें कि वो आपके मार्गदर्शक बनें और फिर उनका आशीर्वाद लेकर पूरे आत्मविश्वास के साथ उठें*


         *राम राम जी*

                🙏🙏

 *आप सभी जन अपने अपने कर्म पर ध्यान दें और  अपनी अपनी जन्मकुंडली के ग्रह,  ग्रह योग,नक्षत्र, राशि भाव, दशा महादशा के अनुसार जो जो उपाय, परहेज़ दान, पूजा पाठ  हवन जप दान  बनते हो उन सभी को समय समय पर करते  करवाते रहें इन्हे  कभी भी न भूलें*


          *राम राम जी* 


*Astropawankv*

*Let The Star's Guide You*

*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat. Phone number 9417311379 www.astropawankv.com*



Wednesday, 4 March 2026

रंगों का दिवस होली पर्व की आप सभी जन को हार्दिक शुभकामनाएं

 

रंगों का दिवस होली पर्व पर आप सभी जन को Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं

 *राम राम जी*


*🙏🌹इंद्रधनुष के सात रंगो की तरह आप के जीवन में धन, यश, कीर्ति, आरोग्य ,उल्लास, सफलता, और वैभव का समावेश हो तथा श्री भगवान जी , गुरू महाराज जी आप को चिर काल तक प्रसन्नता के रंगो से सराबोर रखे, ऐसी ईश्वर से मेरी मंगल कामना है। आप एवं आपके परिवार को   "होली"के पावन पर्व की स्नेहभरी हार्दिक एवं अनन्त शुभकामनाएं।*


*https://astropawankv.com/*