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Thursday, 13 August 2026

चंद्र ग्रह और अष्टम भाव

 *चंद्रमा+अष्टम भाव


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*चंद्रमा मातृत्व का कारक ग्रह है।*

 *चंद्रमा+अष्टम भाव *

*चन्द्रमा मनसो जातः*

*शास्त्रों में, ऋषियों ने जिस विराट पुरुष परमात्मा की कल्पना व आराधना की है उनके अनुसार चन्द्रमा का प्राकट्य उनके मन से हुआ, इसलिए चन्द्रमा को मन का कारक कहा गया है।*

*और हम ताउम्र  इसी के पीछे भागते रहते हैं, अपनी बुद्धि रूपी लगाम लगा कर।*

 *आत्मा परमात्मा का अंश है और मन अर्थात चन्द्रमा उनके मन से निकला है।*

*उस मन को जब आत्मा साधती है तो जीवन में ठहराव आता है, और जब बुद्धि साधती है तो भटकाव आता है।*

*मन को बुद्धि के पीछे ज्यादा न भटका कर यदि हम सात्विक कार्यों का निर्वहन करते हुए जीवन यापन करें तो हमारी अन्तिम परिणीती अच्छी होगी।*

*हम हर क्षेत्र में कामयाब होंगे।*

*लेकिन यहां बुद्धि मन को भटकाती अवश्य है और भटकाव  भी सम्भव है, तो परिणाम भी उसीअनुसार ही सामने आ जाता है।*

 *इसी लिए कहा भी गया है कि मन जीते जग जीत।*

*अष्टम में चन्द्रमा को अष्टमेश का दोष तो लगेगा नहीं, क्यों कि सहचर्य के नियम अनुसार इसकी दुसरी राशि नहीं है , तो यह फल सिर्फ अष्टम का करेगा लेकिन अष्टम में बैठ कर चतुर्थ घर पर भी अपना प्रभाव अवश्य देता है कष्ट परेशानियां देता है*

 *पौराणिक शास्त्रकारों ने चन्द्रमा को अष्टम में ज्यादा अच्छा नहीं कहा क्योंकि यह यहां से अलग अलग प्रकार के रोग कष्ट  परेशानी देता है।*

 *जातक श्वास रोगी, अल्पायु ,क्रोधी ,निर्दयी,धन हीन, व्याकुल मन वाला,पाप बुद्धि वाला, दुर्बल अंग वाला निराशा से भरा हुआ छोटी छोटी बातों से परेशान होने वाला हो सकता है।*

 *ये सब चन्द्रमा के पक्ष बल पर निर्भर करेगा।*

*वहीं पक्ष बली हुआ तो, शास्त्र कारों ने इसे अच्छा भी कहा है।*

 *जातक खोजी प्रवृत्ति वाला, बुद्धि मान, धनवान, दानवीर, विदेश भ्रमण करने वाला, गुप्त धन ,पैतृक संपत्ति प्राप्त करने वाला हो सकता है।*

*यहां बैठा चन्द्रमा धर्म या कहें कि नवम की हानी अवश्य करेगा।*

 *जातक भटकाव के कारण दुराचारी हो सकता है।*

 *दुराचार से वह धर्म की हानी करेगा, फल स्वरूप लंबी अवधि वाले रोग पाएगा अति कष्ट प्रद रोग पाता हुआ दुःखी होता हुआ जातक अन्तिम परिणिती को प्राप्त करेगा।*

*अतः दुराचार का त्याग कर सत्कर्मो को करते हुए जीवन यापन करें।*

*ऐसे जातक को शिव आराधना अवश्य करनी चाहिए।*

*शुभ चंद्रमा अष्टम में आयुष्कारक होता है।*

*अष्टम भाव पैतृक संपत्ति, उत्तराधिकार में मिलने वाली संपत्ति का भाव भी है लेकिन वो उसका पूर्ण रूप से सुख प्राप्त नहीं कर पाता*

*किसी जातिका ने गर्भ धारण किया हो या फिर संतान होने वाली हो उस का खास ध्यान रखना चाहिए।*

*उसकी होने वाली संतान को हानि पहुंचाई जा सकती है।*

*कोई तंत्र मंत्र उन दोनों पर किया जा सकता है।*

*सामुहिक परिवारों में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है।*

*ईष्र्या वश परिवार का ही कोई व्यक्ति यंत्र मंत्र तंत्र करवा देता है।* 

*जिसके कारण से वो जातक और उसका परिवार पूरी आयु यानि वो परिवार अपने जीवन काल में कष्ट परेशानियों वाला जीवन जीता रहता है और उसको इस कारण एक प्रकार से भटकाव में ही भटकता रहता है*

*पौराणिक ग्रंथों में भी इसके उदाहरण मिलते हैं।*

*कई बार राज्य के होने वाले उत्तराधिकारी कोउसके जन्म से पहले या जन्म लेते ही मरवा दिया जाता था।*

*अगर होने वाले शिशु से किसी प्रकार की हानी की आशंका हो तो उसे मार दिया जाता था या मरवा दिया जाता था।*

*उदाहरणार्थ कंस को देख सकते हैं किस प्रकार से उसने देवकी की संतानों को मारा।*      

*अष्टम भाव में चंद्रमा होने पर.....*

*अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा व्यक्ति को एक गहरी भावनात्मक समझ प्रदान करता है। ऐसे लोग केवल शब्द नहीं सुनते, बल्कि सामने वाले के मन की अनकही भावनाओं को भी महसूस कर लेते हैं। जहाँ दूसरे लोगों को किसी व्यक्ति को समझने में समय लगता है, वहीं ये लोग थोड़ी-सी बातचीत में ही उनके मन की स्थिति को पहचान लेते हैं*

*इसी गहरी संवेदनशीलता के कारण ये बहुत अच्छे काउंसलर बन सकते हैं। इनकी बातों में ऐसा अपनापन और समझ होती है कि सामने वाला सहज होकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कर पाता है। ये केवल सलाह नहीं देते, बल्कि व्यक्ति के दर्द की जड़ तक पहुँचकर उसे समझने का प्रयास करते हैं और उसका निवारण करने में उनकी सहायता भी करते हैं*

*अष्टम भाव का चंद्रमा व्यक्ति के भीतर स्वाभाविक हीलिंग ऊर्जा भी देता है। ऐसे लोग दूसरों को भावनात्मक रूप से संभालने, उनका आत्मविश्वास लौटाने और कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलने में मदद करने की क्षमता रखते हैं*

*यदि यह चंद्रमा शुभ प्रभाव में हो, तो यह व्यक्ति की अंतर्ज्ञान (Intuition), मनोवैज्ञानिक समझ और दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता को और भी मजबूत बना देता है*

*चंद्रमा माता का कारक ग्रह है अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा माता के लिए अच्छा नहीं माना जा सकता है ।*

 *जातक अपनी माता से अलगाव की स्थिति का सामना करेगा या जातक को अपनी माता का सुख कम होगा। कई बार विद्या प्राप्त करने में परेशानी रूकावटें आती हैं अगर विद्या प्राप्त हो जाए तो माता के सुख में कष्ट परेशानी होती है*

 *जातक अपनी माता के स्वास्थ्य से परेशान रहेगा।*

*चंद्रमा अष्टम भाव में जातक को दयालु बनाता है। साथ ही जातक आध्यात्मिक  व्यक्ति होगा। जातक आराम से जिंदगी जीना पसंद करेगा पर द्वंद्व उस के जीवन में बना रहेगा*

*अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक को रूपवती पत्नी देता है जो बुद्धिमान और ज्ञानवान होगी।*

 *जातक को अपने व्यवहार के अनुकूल पत्नी प्राप्त होगी*

 *यदि चंद्रमा अष्टम भाव में पीड़ित हो तब यह जातक के जीवनसाथी का स्वास्थ्य खराब कर सकता है।*

*चंद्रमा अष्टम भाव से अपनी पूर्ण दृष्टि दुसरे भाव पर डालता है अतः जातक देखने में सुंदर और मीठा वचन बोलने वाला विद्वान व्यक्ति हो सकता है*

*जातक हंसमुख प्रवृत्ति का होगा लेकिन कभी-कभी यह जातक को अपमानजनक स्थिति और जग हंसाई का सामना भी करवा सकता है।*

*अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक के स्वास्थ्य को कमजोर कर सकता  है ।* 

*अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक को मानसिक परेशानी देता है क्योंकि चंद्रमा मन का कारक ग्रह है।* 

*चंद्रमा एक जलीय तत्व का ग्रह है अतः अष्टम भाव में चंद्रमा जातक को कफ दोष दे सकता है।*

 *चंद्रमा हमारे पाचन तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है अतः अष्टम भाव में चंद्रमा जातक के पाचन तंत्र को कमजोर कर सकता है जिसके कारण जातक पेट से संबंधित समस्या से पीड़ित रह सकता है।*

 *अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक को आंतों से संबंधित समस्या दे सकता है ।*

 *अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक को फेफड़ों से संबंधित समस्या दे सकता है जिसके कारण जातक को श्वास लेने में दिक्कत हो सकती है ।*

 *अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक की नेत्र शक्ति को कमजोर करता है। ओवरऑल अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा क्या रिजल्ट देगा, यह चंद्रमा की राशि और नक्षत्र पर निर्भर करता है।*

*अष्टम भाव मृत्यु भाव के रूप में जाना जाता है, यदि बली चंद्रमा अष्टम भाव में अवस्थित हो जातक की आयु अच्छी होती है।*

 *लेकिन यदि अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा कमजोर हो तब जातक मध्यम आयु या अल्पायु का हो सकता है।*

 *अष्टम भाव का चंद्रमा बालारिष्ट योग दोष का निर्माण करता है। जातक दुबला पतला और कमजोर कद काठी का हो सकता है।*

*चंद्रमा मन का कारक ग्रह होता है।*

 *अष्टम भाव में स्थित चंद्रमा जातक के आत्मविश्वास में कमी कर सकता  है।*

 *जातक मानसिक परेशानी से घिरा रह सकता है ।*

*कभी कभी सब कुछ होते हुए भी जातक असंतुष्ट रहेगा ।*

*उच्च पद पर रहते हुए भी संतुष्टि की कमी।*

 *उसके मन में अनिश्चित भय हो सकता है। जातक बुद्धिमान होगा पर अपने भय पर काबू न रख पाने के कारण परेशान रहेगा और अपने मस्तिष्क का सदुपयोग नहीं कर पाएगा।*

*अष्टम भाव गुह्य भाव तो है ही साथ में इसे श्मशान भी कहा जाता है और ठहरा पानी जो खराब है पीने लायक नहीं है, गंदा पानी, खारा जहरीला और शमशान का पानी।*

*काल पुरुष कि कुंडली का चतुर्थ का स्वामी चन्द्रमा जो निर्मल बहता जल है,*

*अष्टम में आकर अपने आप को बंधन में महसूस करता है, मानसिक तौर पर।*

*कुछ मायनों में तो यह अच्छा जैसे रिसर्च, ज्योतिष, वकालत, टीचिंग, आयुर्वेद डाक्टरी इत्यादि।*

*लेकिन अगर जातक इन सब कामों में नहीं है तो मानसिक तौर पर विक्षप्त भी हो सकता है।*

*साधारण भाषा में कहें तो उसे पागल पन के दौरे यदा कदा पड़ सकते हैं।*

*जातक को यदा कदा सुसाइडल विचार भी आने की संभावना रहती है।*

*उसे ऐसा आभास हो सकता है कि उस पर किसी ने कुछ किया कराया है।*

*चंद्रमा अगर अष्टम में होगा तो ऐसे में पेट से जुड़ी हुई  परेशानियां हो सकती हैं*

*ऐसे लोगों को मानसिक परेशानियां बहुत जल्दी हो जाती हैं*

*यात्रा में परेशानी हो सकती है*

*मां के साथ तालमेल प्यार की कमी हो सकती है* 

*चंद्रमा अगर बुरे प्रभाव में आ जाए तो ऐसे लोगो के विचार सुसाइड करने वाले भी हो सकते हैं*

*मेडिकल  ,आयुर्वैदिक, देसी घरेलू नुस्खे का ज्ञान या फिर किसी भी प्रकार के ज्ञान देने वाले  में भी बन सकते हैं*

*आज के लिए इतना ही.. ... बाकी का फिर कभी....

*Astropawankv*

*Let The Star's Guide You*


*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379  www.astropawankv.com*

Wednesday, 29 July 2026

गुरू पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं

 *गुरु पूर्णिमा*


*गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा:*


  *गुरु साक्षात परम ब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नम:।*


           🙏🙏


*हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर*'




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*यानी भगवान के रूठने पर गुरु की शरण मिल जाती है, लेकिन गुरु अगर रूठ जाए तो कहीं भी शरण नहीं मिलती। गुरु की जरूरत हमें अपने जीवन चक्र में पग पग पर पड़ती हैं वो जरूरत चाहे किसी भी रुप में हो। गुरु हमें किसी भी रुप में, किसी भी रिश्ते में मिल सकता है  इसलिए जीवन में गुरु का विशेष महत्व  है। मान्यता है कि आप जिसे भी अपना सच्चे मन से दिल से गुरु मानते हों, गुरु पूर्णिमा के दिन आपको उसकी पूजा करनी चाहिए आशीर्वाद लेना चाहिए गुरू की पूजा करने से ब आशीर्वाद लेने से जीवन की बहुत सारी बाधाएं दूर हो जाती है।*


*गुरु पूर्णिमा कब होती है।*


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             *आषाढ मास की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा कहा जाता है।*


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             *चातुर्मास के चार मास तक प्रवाचक,  साधु संत एक ही स्थान पर रह कर ज्ञान गंगा बहाते है। चातुर्मास के चार मास मौसम के अनुसार भी सर्वश्रेष्ठ होते है  अध्यन के लिए भी सर्वश्रेष्ठ माने गये है। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता और फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है उसी प्रकार गुरु चरणो मे  उपस्थित साधक को ग्यान शक्ति   और भक्ति प्राप्त होती है।*



*गुरु पूर्णिमा किस के नाम पर मनायी जाती है।*


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        * *गुरु पूर्णिमा गुरु की पूजा अर्चना के लिए विशेषतः मनायी जाती है। महाभारत के रचियता कृष्ण द्वैपायन का जन्म गुरु पूर्णिमा के दिन हुवा था। कृष्ण द्वैपायन संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित थे और चारो वेदो के रचियता भी कृष्ण द्वैपायन ही थे इस लिए इनको में वेद व्यास भी कहा जाता है। कृष्ण द्वैपायन के सम्मान में इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। भक्ति काल में संत कबीर के शिष्य श्री घासी दास का जन्म भी इसी दिन हुआ था।*



*शास्त्रो के अनुसार गुरु शब्द का अर्थ।*


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                *शास्त्रो के अनुसार गु का अर्थ- अंधकार मूल अज्ञान और रु का अर्थ- निरोधक अर्थात अंधकार हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ही गुरु कहते है।*



 गुरु का महत्व।


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            * *गुरु के विना ज्ञान नही मिल सकता है। गुरु को पाने के लिए भी उतनी ही तपस्या करनी पडती है जितनी ईश्वर को पाने के लिए।  सच्चा गुरु ही हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ला सकता है। संत कबीर दास जी ने गुरु को ईश्वर से भी बडा निम्न दोहे  में बताया है।*



*"गुरु गोबिन्द दोऊ खडे, काके लागू पाय।*


*बलिहारी गुरु आपने, गोबिन्द दिये बताय।।"*




*गुरु पूर्णिमा की... आप सभी जन को हार्दिक शुभकामनाएं*



 *गुरु ह्रदय में , सदा  गुरु  ही है  भ्रम  का  काल*


*गुरु  अवगुण  को  मेटते,  मिटे  सभी  भ्रमजाल*


*मेरे सुख-दुख में, अच्छे- बुरे वक्त में , व्यवसाय के क्षेत्र में या सामाजिक व धार्मिक कार्य में, कोई मित्र के रूप में , कोई मार्गदर्शक के रूप में तो कोई शुभचिंतक के रूप में  आप लोगों ने मुझे समय समय पर मार्गदर्शन देकर मेरे मनोबल को बढ़ाया है, मुझे सही रास्ता दिखाया है*, 




*आप जैसे सभी आदरणीय स्नेही मित्र शुभचिंतकों  व पूज्यनीय गुरुओं को नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ और गुरुपूर्णिमा की बधाई देता हूँ....*


      *|| *गुरु पूर्णिमा की हार्दिक बधाई ||*


                    ✍☘💕




*Research Astrologers Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) & Monita Verma Astro Vastu Verma's Scientific Astrology and Vastu Research Center Ludhiana Punjab Bharat Phone number..9417311379. www.astropawankv.com*







Wednesday, 6 May 2026

ज्योतिष शास्त्र (वैदिक) पितृ ऋण दोष




 *ज्योतिष शास्त्र (वैदिक) में पित्रादि-दोष (ऋण) या श्राप की सही पहचान और निदान।*


*"पित्र-श्राप" का सही पता सिर्फ जन्म कुण्डली देखकर ही नहीं लगाया जा सकता है, अपितु कुंंडली ना होने पर इसके अलावा प्रश्न कुंडली, हस्त-रेखा (सामुद्रिक विज्ञान),  अपराविज्ञान और शकुन शास्त्र के माध्यम से भी "पित्र दोष" का सही पता लगाया जा सकता है, परन्तु प्राय ये विधिंयाँ प्रचलन में नहीं है लुप्तप्राय सी हो गयी हैं।*

मुख्य रूप से जन्म कुण्डली से ही पित्र दोष का निर्णय किया जाता है। 

        चार प्रकार के प्रवल पित्र-दोष :- 

              

*सूर्य.... आत्मा एवं पिता का कारक गृह है पित्र पक्ष का विचार सूर्य से होता है।*  


*"चन्द्रमा" मन एवं माता पक्ष का कारक ग्रह है।* 


*मंगल...  हमारे रक्त , जीन्स, परम्परा, पौरुष और बंधुत्व पक्ष का कारक ग्रह है।*


*शुक्र.... भी हमारे भोग, ऐश्वर्य और स्त्री पक्ष का कारक ग्रह है।*


सूर्य जब राहु- की युति में हो तो ग्रहण योग बनता है, सूर्य का ग्रहण अतः पिता या आत्मा का ग्रहण हुआ यानि पित्र-श्राप या श्रापित आत्मा। और चंद्र केतु की युति, अमावस्या दोष या चंद्र ग्रहण दोष भी एक प्रकार का पित्र दोष ही होता है 

      *चार अत्यंत कष्टकर पित्र-दोष :-*

 "सूर्य"---- सूर्य राहू सूर्य शनी या सूर्य केतु की युति पित्र दोष का निर्माण करती है।


 "चन्द्र"--- अगर राहू, केतुु , शनी या सूर्य की युति  ग्रहण में हो तो पित्र दोष (मातृ पक्ष) होता है। 


"मंगल"--- भी यदि पूर्णास्त है या इन क्रूर ग्रहों से युक्त है तो भी वंशानुगत पित्र दोष होता है।


"शुक्र"--- या सप्तम भाव यदि सूर्य, मंगल, शनी या राहु से युक्त हो तो भी स्त्री पक्ष से पित्र श्राप बनता है।

*वैसे समस्त ग्रहों के दूषित होने से कुंंडली में विभिन्न प्रकार के अन्य पित्रादि श्राप भी बन सकते हैं.... परंतु अभी हम कुछ प्रमुख पित्र दोषों (श्रापों) को समझने की कोशिश करते  हैं :-*

शनि सूर्य पुत्र है, यह सूर्य का नैसर्गिक शत्रु भी है, अतः शनि की सूर्य पर दर्ष्टि भी पित्र दोष उत्पन करती है। इसी पित्र दोष से जातक आदि-व्याधि-उपाधि तीनो प्रकार की पीड़ाओं से कष्ट उठाता है, उसके प्रत्येक कार्ये में अड़चनें आती रहती हैं, कोई भी कार्य सामान्य रूप से निर्विघ्न सम्पन्न नहीं होते है, दूसरे की दृष्टि में जातक सुखी-सम्पंन दिखाई तो पड़ता है, परन्तु जातक आंतरिक रूप से दुखी होता रहता है, जीवन में अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है, कष्ट किस प्रकार के होते है इसका विचार व निर्णय सूर्य राहु की युति अथवा सूर्य शनि की दृष्टि सम्बन्ध या युति जिस भाव में हो उसी पर निर्भर करता है, कुंडली में चतुर्थ भाव नवम भाव, तथा दशम भाव में सूर्य राहु अथवा चन्द्र राहु की युति से जो पित्र दोष उतपन्न होता उसे श्रापित पितृ दोष कहते है, इसी प्रकार पंचम भाव में राहु गुरु की युति से बना गुरु चांडाल योग भी प्रबल पितृ दोष कारक होता होता है, संतान भाव में इस दोष के कारण प्रसव कष्टकारक होते हैं, आठवे या बारहवे भाव में स्थित गुरु प्रेतात्मा से पित्र दोष करता है, यदि इन भावो में राहु बुध की युति में हो तथा सप्तम, अष्टम भाव में राहु और शुक्र की युति में हो तब भी पूर्वजो के दोष से पित्र दोष होता है, यदि राहु शुक्र की युति द्वादश भाव में हो तो पित्र दोष स्त्री जातक से होता है इसका कारण भी स्पष्ट कर दें क्योंकि बारहवाँ भाव भोग एव शैया सुख का स्थान है, अतः इस भावके दूषित होने से स्त्री जातक से दोष (श्राप) होना स्वभाविक है ये अनैतिक संबंधों का कारण भी हो सकता है।

          *अन्य श्रापित योग :-*

अगर कुण्डली में  अष्टमेश राहु के नक्षत्र में तथा राहु अष्टमेश के नक्षत्र में स्थित हो तथा लग्नेश निर्वल एवं पीड़ित हो तो जातक पित्र दोष एव भूत प्रेतादि आदि से शीघ्र प्रभावित होते हैं।


अगर जातक का जन्म सूर्य चन्द्र ग्रहण में हो तथा घटित होने वाले ग्रहण का सम्बन्ध जातक के लग्न, षष्ट एव अष्टम भाव से बन रहा हो तो ऐसे जातक पित्र दोष,भूत प्रेत, एव आत्माओं के प्रभाव से पीड़ित रहते हैं।


 अगर लग्नेश जन्म कुण्डली में अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो तथा राहु , शनि, मंगल के प्रभाव से युक्त हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत्माओं का शिकार होता है।


अगर जन्म कुण्डली में अष्टमेश पंचम भाव तथा पंचमेश अष्टम भाव में स्थित हो तथा चतुर्थेश षष्ठ भाव में स्थित हो और लग्न या लग्नेश पापकर्तरी (प्रतिबंधक) योग में स्थित हो तो जातक मातृ श्राप एवं अतृप्त मात्र आत्माओं से प्रभावित होता है।


 अगर चन्द्रमा जन्म कुण्डली अथवा नवमांश कुण्डली में अपनी नीच राशि में स्थित हो या चन्द्र एव लग्नेश का सम्बन्ध क्रूर एव पाप ग्रहो से बन रहा हो तो जातक पित्र दोष, प्रेत-वाधा, एवं 

पित्रात्माओं से प्रभावित होता है।


 अगर कुंडली में शनि एव चन्द्रमा की युति हो अथवा चन्द्रमा शनि के नक्षत्र में, अथवा शनि चन्द्रमा के नक्षत्र में स्थित हो तो जातक पित्र दोष,  एव अतृप्त आत्माओं से शीघ्र प्रभावित होता है।


अगर लग्नेश जन्म कुंडली में अपनी शत्रु राशि में निर्बल आव दूषित होकर स्थित हो तथा क्रूर एव पाप ग्रहो से युक्त हो तथा शुभ ग्रहो की दृष्टि लग्न भाव एव लग्नेश पर नहीं पड़ रही हो, तो जातक प्रेतात्माओं, एव पित्र दोष से पीड़ित होता है।


अगर जातक का जन्म कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी के मध्य हुआ हो और चन्द्रमा अस्त, निर्बल, एव दूषित हो, अथवा चन्द्रमा पक्षबल में निर्बल हो, तथा राहु शनि से युक्त नक्षत्र परिवर्तन योग बना रहा हो तो श्राप के कारण जातक अदृश्य रूप से मानसिक बाधाऔं का शिकार होता है।


अगर कुंडली में चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में स्थित हो तथा अन्य क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव चन्द्रमा, लग्नेश, एव लग्न भाव पर हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से प्रभावित होता है।


अगर कुंडली में गुरु का सम्बन्ध राहु से हो तथा लग्नेश एव लग्न भाव पापकर्तरी योग में हो तो जातक को अतृप्त आत्माए अधिक परेशान करती है ।


अगर बुध एव राहु में नक्षत्रीय परिवर्तन हो तथा लग्नेश निर्बल होकर अष्टम भाव में स्थित हो साथ ही लग्न एव लग्नेश पर क्रूर एव पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृप्त आत्माओं से परेशान रहता है और मनोरोगी बन जाता है।


अगर कुंडली में अष्टमेश लग्न में स्थित हो (मेष लग्न को छोडकर अन्य लग्नों में) तथा लग्न भाव तथा लग्नेश पर अन्य क्रूर तथा पाप ग्रहो का प्रभाव हो तो जातक अतृपत आत्माओं का शिकार होता है।


अगर जन्म कुण्डली में राहु जिस राशि में स्थित हो उसका स्वामी निर्बल एव पीड़ित होकर अष्टम भाव में स्थित हो तथा लग्न एव लग्नेश पापकर्तरी योग में स्थित हो तो जातक ऊपरी हवा, प्रेत बाधित और आत्माओं से परेशान रहता है ।


*ऐसे और भी बहुत से ग्रह योग जन्म कुंडली में होते हैं जिन्हें गहराई से अध्ययन अवलोकन करने पर बहुत कुछ जाना जा सकता है*

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 *सिर्फ इतना ही नहीं और भी दूषित ग्रहों से पित्र-ऋण (श्राप) दोष भी बनते हैं जो जीवन में बहुत ही अवरोध पैदा करके नाना प्रकार के कष्ट देते हैं :-* 

           जैसे:-

*पित्र दोष(श्राप) के कारण व प्रकार*

     1- "सूर्य" से पिता, चाचा, ताऊ, दादा, परदादा, नाना, मामा, मौसा या समतुल्य पैत्रिक (पित्रपुरुस) ऋण (श्राप)।

    2-"चंद्र" से मातृ, मातृ पक्ष या मात्तुल्य स्त्रियों के ऋण (श्राप)।

     3-"मंगल" से भाई, मित्र, स्नेही या इनके समान पित्रों का ऋण (श्राप)।

    4-"बुध" से बहन-भांजी बुआ, साली, ननद या समतुल्य का ऋण (श्राप)।

    5-"गुरू" से गुरुदेव, ब्राह्मण, महात्मा, ज्ञानीजन, शिक्षक, विद्वान, पंडित या कुल पूज्य पुरुस आदि का  ऋण (श्राप)।

     6-"शुक्र" से पत्नी, प्रेमिका अथवा शैया सुख देने वाली अन्य स्त्रियों का ऋण (श्राप)।।

     7-"शनी" से सेवक, कर्मचारी, मातहत, वेटर, मजदूर, मिश्त्री, चांडाल (डोम), भिकारी, या दीन-दुखियों का ऋण (श्राप)।।

    8-"राहु-केतु" से प्राकृतिक, पर्यावरण, सामाजिक, क्षेत्रपाल, देश, मात्रभूमी, सरकारी अधिकारी, कर चोरी, जाने-अन्जाने की गई हिंसा, जीवहत्या या अनैतिक व्यवहार व व्यापार के अभिश्राप (ऋण)।।

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*हस्त-रेखा से भी:-* 

*भिन्न-भिन्न ग्रह पर्वतों के योग एवं पर्वतों पर पाऐ जाने वाले चिन्ह जैसे:- क्रोस, जाल, द्वीप, वलय, भंग, दाग (तिलादि), झाँई, या अन्य अशुभ चिन्हों से भी सभी प्रकार के पित्रादि दोषों (श्रापों) बीमारी को सहजता से जाना जा सकता है।*

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पितृ दोष (श्राप) भी भांति भांति के पाऐ जाते हैं, इन्ही पित्रादि दोषो के कारण जातक को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, अकस्मात दुर्घटनाओं से परेशान रहता है, और शनै-शनै जातक का जीवन नर्क बनता जाता है, एवं कई बार तो दिखने में सम्पंन व्यक्ती भी आंतरिक तौर से पीडित होकर मृतकों जैसा जीवन जीने पर मजबूर हो सकता है और दोष की सही जानकारी ना होने पर श्रापमुक्ती के लिऐ दर-दर भटकता रहता है व तमाम तंत्र, मंत्र, रत्न , व्रत, जाप या उपाय करके भी पीडित दुःखी रहता है उसको कोई लाभ नहीं होता अन्ततः वैदिक तंत्र-ज्योतिषादि को ही ढ़ोंग मान बैठता है।।

        ***********

       *तब  करें क्या:-*

   एक बात ध्यान दें कि मौत के बिना हर बीमारी का इलाज है मगर मौत का कोई ईलाज नहीं हर एक श्राप, दोष, दुर्भाग्य, और पाप का प्रायश्चित कर्म-विधान व उसको करने का सही स्थान और मुहुर्त भी हमारे वैदिक शास्त्रों में बताया है एवं अत्यंत फलदायी भी होता है ये अकाट्य सत्य है वर्तमान कर्मों से ... भविष्य का लेख भी बदल सकता है।।

*अतः जिस तरह पित्रादि-दोष (श्राप) या ऋण कई प्रकार के होते हैं.....   उसी तरह इनके निदान (प्रायश्चित कर्म-विधान) भी देश, काल, परिस्थितियों के आधीन होकर विभिन्न तरीके से ही कराना उचित होता है।*

       *इसलिऐ सर्वप्रथम जातक को... इस विषय के विषेशज्ञ व तत्वज्ञ ज्योतिषाचार्य से उचित  परामर्श लेना चाहिये और तत्पश्चात उसके द्वारा बताऐ गये " मुहुर्त" में ..... पूर्ण श्रद्धा और समर्पण भाव से इन श्रापों (दोषों) का प्रायश्चित कर्म-विधान करवाना चाहिऐ.... तथा आचार्यों द्वारा बताऐ गये नियम-संयमों का पूर्ण विश्वास से पालन करना करें... फिर आप देखेंगे ये दोष भी आपकी उन्नती में मील के पत्थर बन जायेंगे... शुभास्तु।।*

🙏🙏


*Astropawankv*

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