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Tuesday, 14 April 2026

आत्मविश्वास का मंत्र

 *आत्मविश्वास का मंत्र*



*जामवंत जी ने हनुमान जी से ऐसा क्या कहा था जो आज के युवाओं के लिए सबसे बड़ा 'आत्मविश्वास का मंत्र' है?*


*रात के 2 बजे हैं। कमरे में सन्नाटा है, बस घड़ी की टिक-टिक गूंज रही है। नींद कोसों दूर है और सीने में एक अजीब सी धक-धक महसूस हो रही है। सामने एक ऐसा पहाड़ खड़ा है—चाहे वह कोई बेहद अहम परीक्षा हो, जीवन का कोई बड़ा संकट हो, कोई टूटता हुआ रिश्ता हो, या ज़िंदगी का कोई ऐसा मोड़ जहाँ आगे के सारे रास्ते धुंधले नज़र आ रहे हों। उस पल, अंदर से एक ही चीख उठती है...*


*"यार, ये मुझसे नहीं होगा।"*


*हम सबने इस पल को जिया है। उस घुटन को महसूस किया है जब लगता है कि हम अपनी ही उम्मीदों के बोझ तले दब गए हैं।*


*बचपन में जब हम अंधेरे से डरते थे या किसी बात से घबराते थे, तो घर के बड़े-बुज़ुर्ग हमें जीवन-सुधार की कोई 500 पन्नों की भारी-भरकम किताब नहीं थमाते थे। वे बस प्यार से सिर पर हाथ फेरते और कहते, "हनुमान जी का नाम ले लो, सब ठीक हो जाएगा।" बड़े हुए, तो विज्ञान पढ़ा। हर चीज़ को तर्क की कसौटी पर कसना शुरू किया। युवा मन सोचने लगा कि भला कुछ शब्द दोहराने से क्या पहाड़ कट जाएंगे? या समंदर पार हो जाएंगे?*


*लेकिन जैसे-जैसे ज़िंदगी के असली समंदर सामने आए और लहरों ने थपेड़े मारे, तब समझ में आया कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और कथाओं के आवरण में मानव मन का कितना गहरा विज्ञान छिपा कर रखा था। वे केवल कहानियां नहीं कह रहे थे; वे हमारे अवचेतन मन को भीतर से मज़बूत कर रहे थे।*


*आज, 'भारतीय विरासत' की इस यात्रा में, हम किसी अंधविश्वास की नहीं, बल्कि उस गहरे दर्शन की बात करेंगे जो रामचरितमानस की एक चौपाई में छिपा है। एक ऐसी चौपाई जो दुनिया का सबसे बड़ा 'आत्मविश्वास का मंत्र' और निराशा को चीरने वाली 'संजीवनी' है।*


*वह शाम, जब हनुमान जी को उनका 'ईश्वरीय' रूप याद आया*


*एक दृश्य की कल्पना कीजिए।*


*भारत का दक्षिणी छोर। सामने मीलों तक फैला, गर्जना करता हुआ अनंत समुद्र। लहरें इतनी ऊँची मानो आसमान को निगल जाना चाहती हों। तट पर वानर सेना हताश और निराश बैठी है। सीता जी की खोज का समय समाप्त हो रहा है और लंका तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं है।*


*सेना के सबसे वीर योद्धा—अंगद, नल, नील—सब अपनी-अपनी क्षमताओं का आकलन कर रहे हैं। कोई कहता है "मैं जा तो सकता हूँ, पर वापस आने की ऊर्जा नहीं बचेगी।" हर किसी के मन में गहरा संदेह है।*


*और इन सबके बीच, शोर से दूर, एक चट्टान पर चुपचाप हनुमान जी बैठे हैं। सिर झुका हुआ है वे बिल्कुल मौन हैं अपनी ही शक्तियों से अनजान।*


*उन्हें अपनी क्षमताओं का कोई अंदाज़ा नहीं है। बचपन के एक श्राप के कारण वे भूल चुके हैं कि वे पवनपुत्र हैं। तब पूरी सेना के सबसे वयोवृद्ध और अनुभवी जामवंत जी उनके पास जाते हैं। जामवंत जी उन्हें कोई जादुई जड़ी-बूटी नहीं देते। वे उन्हें कोई नया अस्त्र-शस्त्र नहीं थमाते। वे बस उनके पास जाते हैं और एक ऐसा वाक्य कहते हैं, जो इतिहास का सबसे शक्तिशाली मार्गदर्शन बन जाता है:*


*कवन सो काज कठिन जग माहीं।*


*जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥*


*(अर्थ: हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो तुमसे न हो सके? तुम तो राम के कार्य के लिए ही अवतरित हुए हो।)*


*ज़रा ठहर कर सोचिए... क्या जामवंत जी ने हनुमान जी को कुछ नया दिया था? नहीं न। उन्होंने सिर्फ वह याद दिलाया जो पहले से उनके भीतर था।*


*हम अपनी शक्तियां क्यों भूल जाते हैं?*


*हनुमान जी को बचपन में ऋषियों ने श्राप दिया था कि वे अपनी शक्तियां भूल जाएंगे, और जब कोई उन्हें याद दिलाएगा, तभी वे वापस आएंगी।*


*अगर हम इस कथा को आज के तर्क के चश्मे से देखें, तो क्या यह श्राप हम सब पर नहीं लगा है?*


*हम सबका श्राप है—अपनी सोई हुई शक्तियों को भूल जाना। जब हम बच्चे होते हैं, तो हमें लगता है कि हम दुनिया बदल सकते हैं। फिर हम बड़े होते हैं। बार-बार मिलने वाली असफलताओं पर दूसरों की टिप्पणियां और हमारा अपना डर ही हमारे दिमाग पर एक पर्दा डाल देता है। हम मान लेते हैं कि हम बस 'साधारण' हैं। हम अपनी ही बनाई हुई सीमाओं के जाल में फँस जाते हैं।*


*मानव स्वभाव में उस स्थिति को 'मान ली गई हार' कहते हैं। जब इंसान बार-बार हारता है तो वह मान लेता है कि जीतना असंभव है, भले ही परिस्थिति पूरी तरह बदल चुकी हो। हनुमान जी तट पर उसी लाचारी का शिकार होकर बैठे थे।*


*जामवंत: मन को साधने वाले पहले गुरु*


*जब जामवंत जी ने हनुमान जी से कहा—"कवन सो काज कठिन जग माहीं", तो वे मस्तिष्क को साधने की सबसे प्राचीन विद्या का प्रयोग कर रहे थे।*


*जब आप घबराहट में होते हैं और कहते हैं "मुझसे नहीं होगा", तो आपका मस्तिष्क तुरंत उन कारणों की पूरी सूची खोल देता है कि आप क्यों असफल होंगे। लेकिन जब आप खुद से या कोई सच्चा गुरु आपसे कहता है, "ऐसा क्या है जो तुम नहीं कर सकते?", तो मस्तिष्क का ध्यान तुरंत 'समस्या' से हटकर 'समाधान' पर चला जाता है।*


*इस चौपाई का एक-एक शब्द विज्ञान है:*


* *कवन सो काज : यह आपके मस्तिष्क को चुनौती देता है।*


* *कठिन जग माहीं : यह स्वीकार करता है कि दुनिया में चुनौतियां हैं, लेकिन वे असंभव नहीं हैं।*


* *जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं : यह सीधे आपके मन की गहराइयों में असीम आत्मविश्वास का बीज बो देता है।*


*जैसे ही हनुमान जी ने ये शब्द सुने, उनका आत्म-संशय टूट गया। उनके भीतर का वह पर्वत जाग उठा जो सो रहा था। और जब वे जागे, तो उनका स्वरूप कुछ ऐसा था।*


*मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।*


*वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥*


*(अर्थ: जो मन के समान तेज़ हैं, वायु के समान वेगवान हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं... मैं उन श्रीरामदूत की शरण में हूँ।)*


*यह श्लोक बताता है कि जब आप अपने भीतर के संदेह को मिटा देते हैं, तो आपका वेग 'मन' के समान तेज़ हो जाता है। आप जो सोचते हैं, उसे यथार्थ में बदल सकते हैं।*


*आज की पीढ़ी इसका उपयोग कैसे करे?*


*आज हमारे सामने लंका जाने का समुद्र नहीं है। हमारे समुद्र हैं—बेरोजगारी का डर, नए व्यापार के डूबने की चिंता, गहरी उदासी और रिश्तों की उलझनें।*


*जब भी आपको लगे कि आप हार रहे हैं, जब बेचैनी आपको घेर ले और पसीने छूटने लगें, तो फोन पर दूसरों के प्रेरक विचार खोजने के बजाय, एक पल के लिए अपनी आँखें बंद करें...*


*लंबी सांस लें। और खुद के लिए 'जामवंत' बन जाएं। खुद से कहें—"कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥" इसे सिर्फ एक धार्मिक मंत्र की तरह नहीं, बल्कि मन को साधने वाले एक अचूक अस्त्र की तरह इस्तेमाल करें। यह खुद को आदेश देने की सबसे शक्तिशाली तकनीक है। जब आप इसे बार-बार दोहराते हैं, तो* *आपका मस्तिष्क डर के पुराने रास्तों को छोड़कर, जीत और आत्मविश्वास की नई दिशाएँ तय करने लगता है।*


*आप देखेंगे कि जो पहाड़ कल तक अजेय लग रहा था, आज वह बस एक सीढ़ी नज़र आ रहा है।*




*हमारे पूर्वज जानते थे कि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन बाहर नहीं, उसके अपने दिमाग के भीतर बैठा डर है। और उस डर को हराने के लिए उन्होंने हमें ये मंत्र, ये चौपाइयां एक धरोहर के रूप में दीं।*


*वह समुद्र जो हनुमान जी के सामने था, वह केवल खारे पानी का विस्तार नहीं था; वह हमारे और आपके भीतर बैठे 'संदेह' का समुद्र था। और उसे पार करने के लिए किसी बाहरी पुल की आवश्यकता नहीं थी, वह पुल हमारे अपने आत्मविश्वास का था।*


*अगली बार जब दुनिया आपसे कहे या आपका अपना मन आपसे कहे कि* *"तुमसे नहीं होगा", तो मुस्कुराइयेगा। क्योंकि आप उस संस्कृति के वारिस हैं, जहाँ हनुमान जी ने सिर्फ एक वाक्य सुनकर सूरज को फल समझ लिया था और समंदर को एक छलांग में लांघ दिया था।*


*आपके भीतर भी वही राम-काज करने वाली ऊर्जा सो रही है। बस उसे जगाने की देर है!*


 *हमेशा याद रखें कि*

*हर दुःख  हम सभी को एक सबक देता है और हर सबक इंसान को बदल देता है।*



       *सबसे पहले आप सभी जन खुद से प्यार करें,*

*फिर शांत  चित्त होकर बैठें फिर अपने अपने ईष्ट देवी देवता अपने अपने गुरू महाराज जी और परम पिता परमेश्वर परमात्मा जी का ध्यान करते हुए प्रार्थना करते रहें कि वो आपके मार्गदर्शक बनें और फिर उनका आशीर्वाद लेकर पूरे आत्मविश्वास के साथ उठें*


         *राम राम जी*

                🙏🙏

 *आप सभी जन अपने अपने कर्म पर ध्यान दें और  अपनी अपनी जन्मकुंडली के ग्रह,  ग्रह योग,नक्षत्र, राशि भाव, दशा महादशा के अनुसार जो जो उपाय, परहेज़ दान, पूजा पाठ  हवन जप दान  बनते हो उन सभी को समय समय पर करते  करवाते रहें इन्हे  कभी भी न भूलें*


          *राम राम जी* 


*Astropawankv*

*Let The Star's Guide You*

*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat. Phone number 9417311379 www.astropawankv.com*



Wednesday, 4 March 2026

रंगों का दिवस होली पर्व की आप सभी जन को हार्दिक शुभकामनाएं

 

रंगों का दिवस होली पर्व पर आप सभी जन को Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं

 *राम राम जी*


*🙏🌹इंद्रधनुष के सात रंगो की तरह आप के जीवन में धन, यश, कीर्ति, आरोग्य ,उल्लास, सफलता, और वैभव का समावेश हो तथा श्री भगवान जी , गुरू महाराज जी आप को चिर काल तक प्रसन्नता के रंगो से सराबोर रखे, ऐसी ईश्वर से मेरी मंगल कामना है। आप एवं आपके परिवार को   "होली"के पावन पर्व की स्नेहभरी हार्दिक एवं अनन्त शुभकामनाएं।*


*https://astropawankv.com/*





Sunday, 15 February 2026

महाशिवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं

 

महाशिवरात्रि 

 || महाशिवरात्रि 

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आचाण्डालमनुष्याणां भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् 

सौर,गाणपत्य,शैव, वैष्णव, और शाक्त - इन पाँच सम्प्रदायों मे विभक्त विराट हिन्दू साम्राज्य अपने अपने इष्टदेव की उपासना के अतिरिक्त धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष प्राप्त करने हेतु सम्प्रदाय भेद त्याग कर महाशिवरात्रि व्रत का व्यवहारिक जीवन के प्रधान अंग निमित्त पालन करता है । एक बार कैलाश-शिखर पर स्थित पार्वती जी ने महादेव से पूछा -


 कर्मणा केन भगवन् व्रतेन तपसापि वा ।  

  धर्मार्थकाममोक्षणां हेतुस्तवं परितुष्यति ।।


हे भगवन् ! धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष इन चतुर्वर्गों के हेतु तो आप ही हो एवं साधना से संतुष्ट हो मनुष्यों को आप ही इसे प्रदान भी करते हो । अतएव यह जानने की इच्छा है कि आप किस कर्म , किस व्रत या किस प्रकार की तपस्या से प्रसन्न होते हो । अज्ञातज्ञापकं हि शास्त्रम् ' ( शास्त्रीय अनुष्ठानों के मूल मे सर्वत्र उद्देश्य रहता है ) शास्त्रों का कार्य ही यह है कि जो ज्ञात नही है उसे ज्ञात करा दे । पार्वती जी के पूछने पर महादेव कहते हैं -


फाल्गुने कृष्णपक्षस्य या तिथि: स्याच्चतुर्दशी ।

  तस्यां या तामसी रात्रि: सोच्यते शिवरात्रिका ।।


तत्रोपवासं कुर्वाण: प्रसादयति माँ ध्रुवम् । 

 न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्यया ।।


तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासत: ।।


फाल्गुन के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि को आश्रयकर जिस अन्धकारमयी रजनी का उदय होता है उसी को शिवरात्रि कहते हैं । उस दिन जो उपवास करने से मैं जैसा प्रसन्न होता हूँ वैसा स्नान,वस्त्र ,धूप और पुष्प अर्पण से भी नही होता। 


माघकृष्णचतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।  

  शिवलिगंतयोद्भूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।। 


तत्कालव्यापिनी ग्राह्या शिवरात्रि तिथि: ।।


अर्थात् माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी की महानिशा मे आदि देव महादेव कोटि सूर्य के समान दीप्तिसम्पन्न हो शिवलिंग के रूप मे आविर्भूत हुए थे,अतएव शिवरात्रि व्रत मे उसी महानिशा-व्यापिनी चतुर्दशी का ग्रहण करना चाहिये । माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी (गुजरात #महाराष्ट्र के अनुसार माघ)बहुधा फाल्गुन मास मे ही पड़ती है । ईशान संहितानुसार " शिव की प्रथम लिंगमूर्ति उक्त तिथि की महानिशा  ( महानिशा द्वे घटिके रात्रेर्मध्यमयामयो: - चतुर्दशी तिथियुक्त चार प्रहर रात्रि के मध्यवर्ती दो प्रहरों मे पहले की अंतिम और दूसरे की आदि घडी ही महानिशा है ) मे पृथ्वी से पहले पहल आविर्भूत हुयी थी ।


रात्रि के चार प्रहरों मे चार बार 

     पृथक पृथक पूजन का विधान है 


दुग्धेन प्रथमो स्नानं दध्ना चैव द्वितीयके । 

तृतीये तु तथाऽऽज्येन चतुर्थे मधुना तथा ।। 


प्रथम प्रहर मे ईशान मूर्ति की दूध द्वारा , द्वितीय प्रहर मे अघोर मूर्ति की दही द्वारा, तृतीय प्रहर मे वामदेव मूर्ति की घी द्वारा, चतुर्थ प्रहर मे सद्योजात मूर्ति की शहद द्वारा स्नान कर पूजन तत्पश्चात प्रभात मे विसर्जन, व्रतकथा सुन यह कह पारण करने का विधान है ।


संसारक्लेशदग्धस्य व्रतेनानेन शँकर ।

   प्रसीद सुमुखो नाथ ज्ञानदृष्टिप्रदो भव । 


हे शँकर महादेव ! मै नित्य संसार की यातना से दग्ध हो रहा हूँ , इस व्रत से आप मुझ पर प्रसन्न होईये, हे प्रभो संतुष्ट हो कर आप मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान कीजिये । महा शिवरात्रि व्रतानुष्ठान मे शास्त्र का गूढ़ उद्देश्य निहित है वह अज्ञात तत्त्व को बतलाता है इस तत्त्व के जाने बिना अनुष्ठान की कोई सार्थकता नही रहती ।


महादेव , शिव साधन पथ मे ब्रह्मवादियों के लिये ब्रह्म , सांख्य मतावलम्बीयों के लिये पुरुष, योगपद मे आरूढ़ वेत्ताओ के लिये सहस्त्रार मे स्थित प्रणव अर्धमात्रा के रूप मे कीर्तित हुये हैं । पुराणों मे महादेव के आधिदैविक स्वरूप का अधिक विस्तार तथा विविध लीलाओं का वर्णन होने पर भी उनमे वही गूढ़ अध्यात्मिक तत्त्व निहित है , शिवरात्रि व्रत मे भी महादेव का अध्यात्मिक तत्त्व अन्तर्निहित है जो महादेव का दार्शनिक परिचय अन्त: सलिला फल्गु की धारा के समान प्रच्छन्नरूपेण प्रवाहित हो रहा है । उसी स्वादु सुशीतल धारा मे अवगाहन करने के लिये हमे और भी गहरे मे गोता लगाना पड़ेगा ।


महाशिवरात्रि व्रत मे रात्रि एवं उपवास की प्रधानता है ' आहारनिवृत्तिरुपवास:,साधारणत: निराहार रहने को उपवास कहते है । आह्नियते मनसा बुद्धयाइन्द्रिर्वा इति आहार: ' मन , बुद्धि अथवा इन्द्रियों द्वारा जो कुछ आहरण ( बाहर से भीतर ) संचय किया जाता है वही आहार है । स्थूल - सूक्ष्म , भेद से यह दो प्रकार का है , मन आदि से आह्नत संस्कार सूक्ष्म आहार एवं पंच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा गृहीत शब्द-स्पर्श-रूपादि स्थूल आहार है , इसके अतिरिक्त दाल,चावल अन्य व्यंजन स्थूलतर आहार हैं ।


उपवास अर्थात उप - समीप , वास करना । ' शान्तं शिवमद्वैतं यच्चतुर्थं मन्यते ' शिव के समीप रहने मात्र से स्वभावत: मन-प्राण की समस्त रंगीन बत्तियाँ अपने आप बुझने लगती हैं । आहार निवृत्ति अर्थात् सूक्ष्म , स्थूल , स्थूलतर आहार का अत्यन्त आभाव । यथोचितरूपेण अनुष्ठित हो व्रत के बहिरंग अनुष्ठान मे कमी होने पर भी कोई हानि नही होती है । इसी कारण शिवरात्रि व्रत मे उपवास ही प्रधान अंग है ।


|| ॐ नम: पार्वतीपतये हर हर हर महादेव ||

                    



महाशिवरात्रि पर्व पर Astropawankv की पूरी Team की तरफ़ से हार्दिक शुभकामनाएं