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Monday, 26 October 2026

मंगल चतुर्थ भाव में कुछ खास बातें

 




*मंगल चतुर्थ भाव की कुछ महत्वपूर्ण और गहराई से समझने वाले पहलू संक्षेप में जिस पर अगर लिखने पर आए तो पूरी किताब ही इसी पर लिखी जा सकती है पर आज बहुत ही संक्षेप में केवल ध्यान से और गहराई से इस रहस्य को समझनें के लिए...*



जब मंगल चतुर्थ भाव में आता है

तो व्यक्ति केवल घर ही नहीं बनाता

वह अपने भीतर और घर के अंदर  लड़ता  भी है.


चतुर्थ भाव सुख का घर है.


माँ. घर. जड़ें. सुख शांति.

और “मैं भीतर से कितना शांत हूँ”

इसका उत्तर.


जब यहाँ मंगल आता है,

तो भीतर

शांति सहज ही नहीं रह पाती*


मन के अंदर हल्की-सी बेचैनी और कश्मकश

चलती ही रहती है.


कुछ ठीक करना है. और

कुछ बदलना है अंदर ही अंदर ऐसा दौर चलता रहता है*


ऐसे लोग घर को 

passive जगह नहीं मानते.

वहाँ भी अपना ही control चाहते हैं.


मंगल यहाँ

inner security को

action से जोड़ देता है.


तो अगर शांति चाहिए,

 उसे पाने के लिए घर परिवार के अंदर और अपने भीतर के गलत विचारों/ सोच से खुद से लड़ना पड़ता है.


पर एक सूक्ष्म सत्य यह भी है कि


मंगल यहाँ

घर के माहौल में

ताप ( जुबानी आग) ला सकता है.


छोटी छोटी बातों पर तनाव.


मतभेद  बहुत जल्दी

टकराव में बदल सकते हैं.


माँ के साथ

equation intense हो सकती है.


कभी बहुत लगाव.

कभी दूरी.


चतुर्थ भाव

जमीन और संपत्ति का भी है.


इसलिए

property matters में

activity बढ़ती है.


खरीदना. बनाना. सुधारना.


इन चीज़ों में रुचि रहती है.


संतुलित हो तो

ये लोग

strong providers बनते हैं.


घर के लिए

मेहनत करते हैं.


security create करते हैं.


इनकी ताकत है कि

अपनों के लिए खड़े रहना.


पर असंतुलित हो तो

यही मंगल इनकी

inner peace छीन लेता है. और गृहस्थ सुख भी ख़राब कर जाता है 


बाहर लड़ाई,

और भीतर भी लड़ाई.


और तब सुकून

दूर हो जाता है.


एक और गहराई -


चतुर्थ भाव

“सुख” का है.


तो मंगल यहाँ

व्यक्ति को सिखाता है कि


सुख लड़कर नहीं,

संभालकर मिलता है.


जीवन की सीख क्या है?


घर बनाओ,

पर उसमें शांति भी बसाओ.


क्योंकि चतुर्थ भाव का मंगल

तभी शुभ होता है,

जब व्यक्ति


ताकत को

संरक्षण में बदले,

टकराव में नहीं.


तभी घर

सिर्फ दीवार नहीं,

आश्रय बनता है. और सुख शांति लाता है।



और कहीं किसी कारण वश उपरोक्त जन्मकुंडली का मंगल , मंगल बद हो रहा हो तो  तो कहते हैं कि आवा ही उत्त गया वाला हाल होता है इसके बारे में अगले लेख में बात करेंगे

बात बहुत ही संक्षेप में की है लेकीन अगर ध्यान से ओर गहराई से देखें तो पुरी कहानी समझ जाएंगे....

आज के लिए इतना ही काफी बाकी बातें फिर कभी....


*Astropawankv*

*Let The Star's Guide You*

*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 www.astropawankv.com*

Monday, 12 October 2026

नवम भाव में चंद्र ग्रह या अशुभ दोष युक्त चंद्र

 




*नवम भाव में चंद्र ग्रह या दोष युक्त चंद्र ग्रह



*नैसर्गिक रूप से चंद्रमा एक शुभ ग्रह है।*


*पक्ष बली होने के साथ साथ पक्षों से ही इसकी शुभता व अशुभता का विचार किया जाता है।*


*चंद्रमा मन का कारक है और लग्न का अतिविशिष्ट कारक ,तो नवमस्थ होने के कारण जातक धार्मिक विचारों वाला, धर्म में रूचि रखने वाला हो सकता है होगा या नहीं होगा यह उसकी शुभता /अशुभता पर भी निर्भर करेगा यहां  पर अन्य ग्रहों की दृष्टि भी प्रभाव डालेगी फिर भी इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जातक के मन में धर्म के प्रति आस्था अवश्य होगी।*



*काल पुरुष कि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी और माता का कारक होने के कारण माता भी धर्म परायण होगी लेकिन अपने भाव से षडाष्टक होने के कारण उनके स्वास्थ्य में कुछ कमी हो सकती है अपने स्वास्थ्य और मानसिक परेशानी के कारण अंदर ही अंदर परेशान रहती होगी* 


*चतुर्थ भाव से विचारणीय सारे फल जैसे भुमि भवन मकान ,गाड़ी , शान्ति इत्यादि भाग्य से  या कम मेहनत से प्राप्त हो सकते हैं लेकिन षडाष्टक होने के कारण जातक के मन में कुछ परेशानी बनी रह सकती है कि यह मेरा कमाया नहीं है। वह उन सब के प्रति उदासीन भी हो सकता है।*


*सप्तम का अति विशिष्ट कारक होने के कारण भाग्योदय विवाहोपरांत हो ऐसी सम्भावना बनती है।*पत्नी धार्मिक विचारों वाली हो सकती है लेकिन अगर चंद्र दृष्टि या किसी अन्य योग युति के कारण अशुभ हो रहा हो तो विवाह के उपरांत बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है*



*चंद्रमा मन का कारक है।*

*और इसे पुनर्जन्म का  कारक भी माना जाता है।क्यों कि अंत समय जो इच्छा हमारे अंदर होती है उसके अनुरूप ही हमें अगला जीवन मिलता है।*


*अंत मति सो गति*



*भाग्य में सुख होने के बावजूद उसका अनुभव न कर पाना, यह नवम भावस्थ चंद्रमा दर्शाता है।*


*नवम से दशम छठा भाव आता है।*


*भाग्य का पुर्वाध कर्म भाव।*


*जहां से रोग रिपु ऋण और षड रिपुओं का विचार किया जाता है तो यहां पर सम्भावना यह बन सकती है कि जातक पुर्व जन्म में रोग से घिरा हो अंत समय हरि से यही प्रार्थना मन ही मन करे कि मैं आगे धर्म कार्य अथवा हरि संकीर्तन प्रभु भजन अवश्य करूंगा ऐसा ही ऋण में घिरा व्यक्ति भी कर सकता है और कई तो इन सबमें लिप्त ही अंतिम सांस ले लेते हैं और इस जीवन में सब कुछ सुख समृद्धि सम्पत्ति होने के बावजूद अंत तक संघर्ष करते रहते हैं।*


*छठे भाव से नवम भाव , चतुर्थ यानी सुख भाव, होने के बावजूद उस सुख को अनुभव नहीं कर पाते जिसे वह ताउम्र करना चाहते हैं पढ़ाई के बाद सुख तलाशते हैं तो नौकरी में फंस जाते हैं,नौकरी से शादी में, शादी से बीवी बच्चों में, फिर उनकी पढ़ाई लिखाई,शादी विवाह में यानी ताउम्र एक कोल्हू के बैल की तरह लगे रहते हैं मन ही मन एक सुख की तलाश में ही सारा जीवन व्यतीत होता हुआ दिखाई देता है लेकिन ध्यान से देखें तो उनको यानी उन्हें वह सुख प्राप्त होता है बस वह उसका आपाधापी वाले जीवन में अनुभव ही नहीं कर पाते वो समझ ही नहीं पाते हैं*


*कुछ ऐसा ही नवमस्थ चंद्रमा का प्रभाव मन पर भी देखने को मिलता है।*

*नवम भाव में चन्द्रमा का होना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं पुर्व जन्म में, अंत समय हमारे मन में जरुर कोई धार्मिक कार्य करने की इच्छा, अथवा धर्म स्थलों पर जाने की इच्छा, अथवा धार्मिक आध्यात्मिक पुस्तको को पढ़ने की इच्छा जागृत हुई होगी या फिर किसी कारण वश यह इच्छा बाकी रह गई होगी जिस कारण हमें यह जन्म मिला है।*जिसमें हमने इन इच्छाओं को पुर्ण करना होता है।*


*लेकिन यह चंद्रमा है , हमें सहुलियत से यह सब उपलब्ध भी हो जाए तो भी वहां नहीं जाएंगे और न ही पठन पाठन करेंगे इसे अन्य ग्रहों की दृष्टि और चंद्रमा के बलाबल और शुभता अनुसार विचारा जा सकता है।*


*उदाहरणार्थ कई बार ऐसे जातकों का जन्म तीर्थ स्थलों के नज़दीक पर तो होता है लेकिन वह अपने पास के ही पौराणिक मंदिर अथवा तीर्थ स्थलों पर सालों साल तक नहीं  जाते और लोग दूर दूर से आकर माथा टेकते हैं और उनकी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है लेकिन जातक खुद नज़दीक होने पर भी फ़ायदा नहीं उठा पाते है*


*और कई बार तो उन्हें स्वयं ही नहीं ज्ञात होता कि जहां उनका जन्म हुआ है वह स्थान बहुत पवित्र और तीर्थ स्थान है जबकि पुर्व के कर्म अनुसार उन्हें फल मिल चुका होता है इसका उन्हें उसका भान ही नहीं होता और अन्य स्थानों के लोग वहां दर्शन करने के लिए आते जाते रहते है।*



*चतुर्थ भाव से षडाष्टक होने के कारण नवमस्थ चंद्रमा वाले जातकों के संबंध अपनी माता से ज्यादा ठीक नहीं रहते जातक के बड़े भाई हों तो यह कुछ ज्यादा ही हो जाता है  माता ध्यान रखती है, और माता का स्नेह भी इन्हें मिलता है, पर फिर भी देखने में आता है कि  माता का झुकाव बड़े पुत्र की ओर ही ज्यादा रहता है।*


*महाभारत में भी कुंती का झुकाव अपने अन्य पुत्रों की अपेक्षा युधिष्ठिर की ओर ज्यादा था अब वो अलग बात है कि वह उसे राजधरोहर मानती थी।*

     

                 *(2)*


*वृहस्पति जगत जब साथ या साथी*

*समुद्री हवाई बहता हो।*

*छोटी बेड़ी से हरदम अपनी*

*बेड़ा जंगी कर लेता हो।*


*यदि किसी भी प्रकार से नवमस्थ चंद्रमा को गुरु का साथ मिल जाए या युति गत हो, चंद्रमा महान सागर की तरह होगा। अर्थात सब तरफ से खुशहाली होगी। समुद्री और हवाई ताकत में बरकत होगी।*धन दौलत जमीन जायदाद सबकुछ होगा।*


*चाहे जातक का जन्म गरीब परिवार में ही क्यों न हुआ हो, वह छोटी बेड़ी अर्थात, छोटे से काम को भी ऊंचाइयों तक ले जाएगा।एक  छोटी सी बेड़ी से बहुत बड़ा बेड़ा खड़ा कर लेगा अपनी जंगी अर्थात मेहनत और भाग्य की बदौलत अपने जीवन में हर तरह के सुख प्राप्त कर लेता है और जीवन में नाम कमा लेते हैं*


*ऐसा जातक अगर समुद्री या वायुसेना में भर्ती हो जाए तो, चंद्र गुरु युति उसे उच्च पदवी पर ले जाएगी। यहां बैठे चंद्रमा की दृष्टि पराक्रम भाव पर होगी, और तृतीय भाव, द्वितीय से द्वितीय अर्थात अगर जातक वाणी से धन कमा रहा होगा अर्थात अगर ऐडवोकेट वकील हुआ तो वह अगर वो प्रयास करे तो जज तक भी बन सकता है अध्यापक, प्रोफेसर है तो डायरेक्टर, वाइस चांसलर बन सकता है कहने का तात्पर्य यह है कि जातक किसी प्रोफेशन में हो तो अगर कुछ मेहनत करे तो उसका  भाग्य उसे चार कदम और आगे ले जाएगा।*



*शास्त्र कहते हैं नवमस्थ चंद्रमा वाला जातक यात्राएं ज्यादा करता है जो कुछ हद तक संभव है लेकिन ज्यादा नहीं क्यों कि यहां दशाएं भी अपना रोल अदा करेंगी जातक लौकिक यात्रा अर्थात इधर-उधर जाना, तीर्थाटन करना कुछ हद तक हो सकता है लेकिन ज्यादा नहीं। क्यों यात्रा वह महीने दो महीने या छह महीने में करेगा कार्य स्थल दूर है तो उसे यात्रा नहीं कह सकते लेकिन जातक यात्रा का शौकीन अवश्य होता है और उसको लंबी यात्रा करने के बाद उसे और परिवार वालों को हमेशा लाभ मिलता है वो लाभ चाहे धन, काम का हो या सेहत शरीर का*


*ध्यान से विचार करें कि चंद्रमा मन का कारक है और किसी कारण वश दूषित अशुभ हो रहा है और यात्रा भाव में बैठा है, ध्यान से देखने पर पता चलता है कि जातक मानसिक यात्राएं बहुत ही ज्यादा करेगा अर्थात अपने स्मरण में दिमाग अपनी सोच में ही से इधर उधर घुमता फिरता रहेगा तृतीय भाव पर दृष्टि है तो आनलाइन यात्रा करने वाला हो सकता है। फोन पर जगह देखेगा और मन ही मन अपने को वहां फिट कर देगा।और घंटों काल्पनिक यात्राएं करता रहेगा और तो और वह कल्पनाओं में गाने भी गाएगा।*


*मैं और मेरी तनहाई*

*अक्सर ये बातें करते हैं।*

*तू होती तो ऐसा होता*

*तू होती तो वैसा होता।*

*कल्पनाओं*

*में वह कहीं भी आ जा सकता है।*


*वह भी अति तीव्र गति से*

*क्यों कि मन की गति का कोई अनुमान नहीं लगा सकता। वह विदेश भी चला जाएगा और तैर कर समुद्र पार भी चला जाएगा लेकिन सिर्फ और सिर्फ अपनी कल्पनाओं में यानी मन से दिल दिमाग़ से*


*लाल किताब  के रहस्यमयी ज्ञान के अनुसार चन्द्र का खाना नं 9 में होना हर प्रकार से चंद्रमा के मित्र बृहस्पति की मिल्कियत है। अतः जब चंद्रमा घर नं. 9 में होगा तो उसमें हर प्रकार से चंद्रमा और बृहस्पति के गुण मौजूद होंगे। ऐसा व्यक्ति शराफतपसंद, नेक दिल और सबका भला चाहने वाला होता है। धर्म-कर्म, तीर्थयात्रा और शुभ कामों में रुचि रखने वाला होता है। दीर्घायु होता है। यदि पांचवें घर से मित्र ग्रहों की मदद प्राप्त हो तो पुत्र सुख में वृद्धि और धर्म के कार्यों में रुचि बढेगी। यदि तीसरे घर में सहायक या मित्र ग्रह होंगे तो धन दौलत में बरकत होगी।*


*घर नं 9 के चंद्रमा को "घड़े बराबर मोती" और "दुनिया का रक्षक समुद्र' कहकर पुकारा गया है। इस घर में चंद्रमा होने से व्यक्ति गणित में निपुण होता है।*


*घर नं. 9 के चंद्रमा के समय जब घर नं. 9 में कोई मित्र ग्रह हो तो ऐसे व्यक्ति के भाग्य अति शुभ होता है। ऐसे व्यक्ति को माता-पिता का सुख लंबी उम्र तक प्राप्त होता है। जब घर नं. 9 के चंद्रमा के साथ बृहस्पति हो या दृष्टि से संबंध बनाए तो ऐसा व्यक्ति गरीब घर में जन्म लेकर भी अपनी एक विशेष पहचान स्थापित करता है।*


*यदि घर नं. 9 के चंद्रमा के साथ किसी प्रकार भी राहु का संबंध बने तो व्यक्ति की अक्ल धोखा खा जाती है ओर वो जातक अक्ल का अंधा भी बन जाता है जिस कारण वह अपने अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पाता। चंद्रमा घर नं. 9 के समय यदि केतु घर नं. 2 में हो और बुध घर नं. पांच में हो तो व्यक्ति की 48 साल तक की उम्र के लिए अशुभ होते हैं दुनियां उसके रिश्तेदार, आस पास वाले उसको यूज करते हैं*


*चंद्रमा घर नं. 9 के समय यदि शुक्र घर न. 3 में हो तो माता की आखों की ज्योति के लिए बुरा रहे, उसकी मां किसी न किसी कारण वश दुःखी रहती है*


*चंद्रमा घर नं. 9 के समय यदि घर नं. 4 में राहु, केतु या शनि हो, तो व्यक्ति संतान की ओर से मां और अपने मन से दुःखी रहे।*


*उपाय*


*1.  मां और बुजुर्गों की सेवा करें, उनका आशीर्वाद ले, बृहस्पति चंद्र शुभ होगा।*


*2. मजदूर को खुश करना चाहिए, दूध पिलाएं या दूध से बनी चीजें खिलाएं*


*3. सापों के स्थान पर दूध रख कर आना चाहिए या मछलियों को चावल डालने चाहिएं।*


*नौवें घर में दो ग्रहों का फल*


*चंद्रमा + मंगल: नौवें घर में चंद्रमा मंगल की युति वाले व्यक्ति की औलाद उत्तम होगी। ऐसा जातक गलत तरीकों से धन कमाकर भी भाग्यवान हो सकता है। यदि इस युति पर राहु, केतु या शनि की दृष्टि हो तो व्यक्ति की मृत्यु किसी दुर्घटना में भी हो सकती है या लंबी बीमारी भी हो सकती है*


*चंद्रमा + शनि : नौवें घर में चंद्रमा शनि की युति व्यक्ति के धन दौलत पर कोई अशुभ असर नहीं डालती। माता की सेहत के लिए अशुभ है। कई बार यह युति व्यक्ति के लिए चर्म रोग का कारण भी बन सकती है, शरीर पर छाले दाग आदि हो सकते हैं। यदि इस युति के समय राशि के कारण फल अशुभ हो रहा हो या इन पर राहु या केतु की दृष्टि हो तो दूध में ज़हर जैसा असर होगा यानी चंद्रमा का फल अशुभ आप दुःखी, माता दुःखी या परेशानियों के साथ*


*चंद्रमा + राहु : नौवें घर में चंद्रमा राहु की युति के समय चंद्रमा का फल आधा रह जाएगा। ऐसे व्यक्ति के जद्दी घर-परिवार में रौनक होगी और सूखे कुओं में भी दोबारा पानी फिर से आ जाएगा। लेकिन चंद्रमा का फल मध्यम रह जाएगा यानी व्यक्ति की माता और उसके अपने मन की शांति के लिए अशुभ , चोट, कष्ट, परेशानी*

*राम राम जी*


*ध्यान से समझें*

*याद रखें कि जीवन एक शतरंज के खेल की तरह है,आपके द्वारा उठाये गए कदम आप कभी वापिस नहीं ले सकते लेकिन आप अपने आने वाले अगले कदम बहुत अच्छे और बेहतर बना सकते हैं...*

 *आप सभी जन केवल अपने अपने कर्म पर ध्यान दें कि आप क्या करते हैं क्या सुनते हैं क्या देखते हैं और किसकी संगत में है इस पर विचार करें*

और  अपनी अपनी जन्मकुंडली के ग्रह, नक्षत्र, राशि भाव, दशा महादशा के अनुसार अपने अपने उपाय, परहेज़ दान, पूजा पाठ जप दान समय समय पर करते  करवाते रहें इन्हे  कभी भी न भूलें*


          *राम राम जी* 

*Astropawankv* 

*आज के लिए इतना ही काफी बाकी बातें फिर कभी......*


*Astropawankv*

    *Let The Star's Guide You*


*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223.  www.astropawankv.com*

Friday, 9 October 2026

नवम भाव का स्वामी दशम भाव में...

 




*नवम भाव का स्वामी- दशम भाव में*


*भाग्येश दशमस्थे तु लोकवन्द्यो गुणी नरः।*


*भूपस्तत्सदृशोऽमात्यः सेनाध्यक्षोऽथवा भवेत् ।।*


*होरारत्न में कहा है कि नवमेश दशमस्थ हो तो मनुष्य गुणवान् लोकपूज्य राजा अथवा तत्सदृश मन्त्री या सेनाध्यक्ष होता है।*


*भाग्येश दशम भाव में हो तो जातक राजा का कार्य करने वाला, राजा से लाभ करने वाला, अच्छे कार्य में आसक्त, माता का अविघ्नकारी और प्रसिद्ध एवं धर्मिक होता है*


*नवमेश दशम में हो तो राजकीय मान सम्मान प्राप्ति व धुरन्धर राजकारणी*


*लोमेश संहिताः*


*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् ।* 


*पुण्यवान्पशुमांश्चापि साहसी क्रोधवर्जितः ।।*


*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम और चतुर्थ भाव में बैठा हो वह मनुष्य मन्त्री या सेनापति होता है। तथा पुण्यवान्, पशुओं को रखने वाला, साहसी और क्रोध से रहित होता है*


*पराशरः*


*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत्।* 


*पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः।।*


*भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति,. पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है*


*मानसागरीः*


*नृपकर्माणं शूरं माता-पित्रोश्च पूजकं पुरुषम् ।* 

*धर्मख्यातं कुरुते सुकृतपतिर्गगनगृहशीलः ।।* 


*नवमेश दशम भाव में हो तो जातक राज कर्मचारी, शूर, माता-पिता का भक्त और धर्मात्मा होता है* 


*यवन जातकः*


*नृपतिकर्मकरो नृपवित्तयुक्सुकृतकर्मकरो जननीपरः । विदितकर्मकरः सुकृताधिपो गगनगे पुरुषो भवति ध्रुवम् ॥*


*जिसके धर्मपति दशम भवन में हो वह पुरुष राजा का कर्म करनेवाला और राजा के धन से युक्त हो तथा श्रेष्ठ कर्म और माता की सेवा में तत्पर विख्यात कर्म करनेवाला होता है*


*भृगु संहिताः*


*धर्मनाथे गते कर्मे भातापित्रोश्च पूजकः ।*

 

*राजमानी प्रियामुक्तः राजद्वारा धनागमः ॥*


*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम स्थान में हों वह मनुष्य माता और पिता की सेवा करने वाला, राजमानी, प्रिया से युक्त और राजद्वार से धन की प्राप्ति करने वाला होता है*


*जातक निर्णय* 


*यदि नवमेश दशम भाव में हो तो जातक काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली होता है। वह उदार होगा और अधिकार वाले पद पर होगा। वह काफी धन अर्जित करेगा और हर प्रकार का आराम प्राप्त करेगा। उसके जीवन यापन का साधन उचित मार्ग होगा और वह कानून का पालन करने वाला नागरिक होगा*


*ज्योतिस्तत्त्वम् :*


*शेशे ऽन्वये सुकृतकर्मकरो नृपस्व-*

*भुग् भूपकर्मकरणोद्यत एप शूरः ।*

*सत्कीर्त्तिमान् सुविदितः पुरुषः सुशास्त्र-*

*विन्मातृवर्गविजयी पितृमातृभक्तः ॥*


*दशम में नवमेश होतो पुण्यकर्म करने वाला राजधन का उपभोग करने वाला, राजकार्य करने में उद्यत, शूरवीर उत्तम कीर्ति वाला, प्रसिद्ध, शास्त्र वेत्ता, मातृ वर्ग में विजय पाने वाला एवं माता पिता का भक्त होता है*


*मानाथभे मातृ‌निकेतने ऽथ वा मार्गाधिनाथे सुकृती च साहसी ।*


*क्रोधोज्झितः कीर्त्तियुतश्चमूपतिर्वाग्ग्मी प्रजातः सचिवः कलेवरी ॥*


*दशम वा चतुर्थ में नवमेश हो तो पुण्यात्मा, साहसी, क्रोध रहित, यशस्वी, सेनापति, शास्त्र सम्मत बोलने बाला एवं मंत्री होता है*


*नवाथेजी-यह भाग्यवान, कीर्तिमान, सफल, पुण्यकार्य करनेवाला तथा धर्मनिष्ठ होगा*


*हमारे विचार-उपर्युक्त फलों में बहुत भाई होना यह फल भाग्येश पापग्रह होकर पुरुष राशि में हो तो अनुभव में नहीं आता। अन्य फल शनि को छोड कर अन्य ग्रहों के बारे में ठीक प्रतीत होते हैं*


                              (2)

*यह तो था जो की शास्त्रों में बताया गया है*

*अब आप ध्यान से पढ़ें  समझें और फिर विचार करें कि.......*


*नवम भाव हमारे भाग्य का भाव है अर्थात पुर्व जन्म कृत कर्मों का फल जो हमें इस जन्म में किए जा रहे कर्म में कुछ सहुलियत प्रदान करता है।*

*भाग्येश यहां कर्म क्षेत्र में बाधा भी उत्पन्न कर सकता है क्यों कि दशम में उसका द्वादशेष है।*


*नवमेश दशम में होगा तो वह योगकारी बन जाएगा क्योंकि त्रिकोण का स्वामी केंद्र में आ गया है।*


*और अपने भाव से द्वि द्वादश का सम्बन्ध बना लेगा।*


*अर्थात धन दायक तो होगा लेकिन व्ययकारक भी हो जाएगा।*


*एक हाथ ले एक हाथ दे।*

*भाग्य पती कर्म भाव में होगा तो वह लाभ के साथ साथ अवरोध भी पैदा कर देगा।*


*क्यों कि भाग्य से ज्यादा मिलना मुश्किल है।*


*अर्थात कर्म जितना मर्जी कर ले , लेकिन अगर भाग्य में ही नहीं लिखा तो कहां से मिल जाएगा।*


*इसलिए मानसिक*


 *तनाव का कारण बन सकता है।*


*लेकिन भाग्य अनुकूल हुआ तो कम काम से भी अधिक लाभ मिल सकता है।*


*ग्रह की युति दृष्टि के कारण कुछ अधिक प्राप्त हो भी सकता है, लेकिन भाग्येश होने के कारण वह सब संचित जा भी सकता है।*


*इसीलिए यहां ज्यादा भाग्य के भरोसे न रह कर कर्म पर ही विश्वास रखना चाहिए।*


*क्यों कि यह भाव कालपुरूष की कुंडली में कर्म के स्वामी शनि का भाव है।*


*अतः इस भाव में भाग्य तभी चमकेगा जब कर्म के साथ साथ सात्विकता अर्थात धर्म परायणता हो,*


*चोरी चकारी अथवा गैर कानूनी कार्य न हो।*


*क्यों कि यह राज क्षेत्र है तो यहां गैरकानूनी ढंग से किए गए कार्य से राजदंड मिलना भी तय है।*


*और यहां का राजदंड देता है शनि , कर्म फल दाता शनि, और वह फल अपने दो चेलों राहु केतु के माध्यम से देगा।*


*अर्थात राहु केतु दंड देंगे और अन्य ग्रह उससे बचने के लिए या उसके अनुसार कर्म में लग जाएंगे।*


*मजे की बात यहां स्वयं शनि भी उनके द्वारा निर्धारित दंड को भोगेगा।*

*अर्थात यह सब ग्रह मिलकर जातक के उत्थान और पतन दोनों के लिए कार्य करेंगे।*


*बचेगा वही जो ग्रहानुसार कर्म करेगा।*


*मकर का  मैदान है तो संघर्ष तो रहेगा ही रहेगा चाहे स्वयं ईश्वर ही क्यों न हों लीला रूप में ,जीव रूप में*


*नवमेश दशमस्थ हो तो ऐसा जातक कर्म स्थल पर बहुत ज्यादा धर्म पारायण हो सकता है।*


*लेकिन वह वैसी धर्म पारायणता स्वयं के लिए नहीं समझता।*


*वह कोई न कोई मार्ग अलग से जरूर निकाल लेगा ताकि धर्म पारायणता भी रह जाए और काम भी हो जाए।*


*उदाहरणार्थ*

*उदाहरण कुछ अलग हो सकता है फिर भी इससे भाव को समझा जा सकता है।*


*भगवान कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन के हाथों कई योद्धाओं का अनैतिक तरीके से या नियमों की अवहेलना करते हुए वध करवा दिया।*


*जैसे भीष्म, कर्ण, भीम के हाथों दुर्योधन इत्यादि।*


*लेकिन वहीं बात अपने पर न आए उसके लिए धर्म पारायण तर्क भी रख दिया कि उन योद्धाओं ने कौन सा नियमों का पालन किया था।*


*कहने का तात्पर्य यह कि नवमेश दशमस्थ हो तो जातक अगर कोई अनैतिक कार्य*


 *भी करता*

 *है तो उसके पीछे नैतिक तर्क जरूर रख देगा।*


*लेकिन ऐसा नहीं है कि वह अनैतिक कर्म फल से भाग जाएगा या बच कर निकल जाएगा,*


*मकर राशि में उसके सारे कर्म रिकॉर्ड हो जाएंगे और उसे उसका भुगतान अगले जन्म में तो क्या इसी जन्म में भी करना होगा।*


*उसका वर्तमान का परिवार वर्तमान के सारे मिलने जुलने वाले उसके कर्म अनुसार या तो देकर जाएंगे नहीं तो लेकर तो जाएंगे ही।*


*आज कल भी प्रायः देखने को मिल ही जाता है, अनैतिक ढंग से कमाया धन , देर सवेर किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।*


*इसे आप कर्ज अदायगी या फर्ज अदायगी भी कह सकते हैं।*


*क्यों कि अग्नि त्रिकोण, धर्म त्रिकोण हमारी फर्ज अदायगी भी है।*



*वैदिक ज्योतिष में जब नवम भाव का स्वामी (भाग्येश) दशम भाव (कर्म भाव) में स्थित होता है, तो यह अत्यंत शुभ और शक्तिशाली राजयोग बनाता है, जिसे धर्म-कर्माधिपति राजयोग कहा जाता है मुख्य प्रभाव और फल कर्म ही भाग्य बनता है: नवम भाव भाग्य का है और दशम भाव कर्म का। जब भाग्य का स्वामी कर्म स्थान में जाता है, तो जातक की मेहनत और ईमानदारी ही उसके भाग्य का सबसे बड़ा निर्माण करती है। व्यक्ति जो काम करता है, वही उसकी पहचान और पूजा बन जाती है।*


*नवम भाव विदेश, या दूरस्थ क्षेत्रों की यात्राओं और नए अनुभवों का भाव माना जाता है। जब इसका स्वामी दशम भाव में आता है, तब जातक को विदेश या दूरस्थ क्षेत्रों में जाने का अवसर या दूर स्थानों पर काम करने के मौके मिलते हैं*


*ऐसे लोग अकसर विदेश या दूरस्थ क्षेत्रों में पढ़ाई, नौकरी या बिज़नेस के ज़रिए अपने करियर को नई ऊँचाई देते हैं। अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो यह योग व्यक्ति को ग्लोबल एक्सपोज़र, नए कॉन्टैक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला सकता है*



*जब नवम भाव का स्वामी दशम भाव में आता है, तब यह स्थिति जीवन में कर्म और भाग्य का शक्तिशाली मेल बनाती है। ऐसे जातक अपने क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते हैं फिर चाहे वह नौकरी हो, प्रशासनिक सेवा, राजनीति या स्वयं का व्यवसाय ,भाग्य यहाँ कर्म के साथ खड़ा रहता है, जिससे सफलता सहज और स्थायी बन जाती है।*


*यह योग अक्सर राजयोग तुल्य फल देता है — व्यक्ति को उच्च पद, प्रतिष्ठा और समाज में पहचान दिलाता है। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में “role model” की तरह माने जाते हैं, क्योंकि उनका जीवन यह संदेश देता है कि “भाग्य उन्हीं का साथ देता है, जो कर्म में आस्था रखते हैं*


*अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो जातक को सम्मान, पदोन्नति और लोक-मान्यता मिलती है। लेकिन अगर ग्रह अशुभ प्रभाव में हो, तो उन्नति में विलंब या बार-बार बाधाएँ आ सकती हैं। फिर भी, यह स्थिति इतना मजबूत संयोग है कि व्यक्ति अंततः अपने परिश्रम और आस्था से आगे निकल ही जाता है*




*काम और धर्म values का connection*


*ऐसा profession पसंद आता है जिसमें knowledge, advice, management, law, finance, teaching, astrology, administration या public dealing शामिल हो।*



*नवमेश दशम में हों तो व्यक्ति की  अपने “काम”को ही अपनी पूजा-पाठ यानि अपना कर्म और धर्म बना लेना चाहिए फिर देखें की क्या बनता है।*


*“भाग्य भी career में ही लगाना है और career को ही अपना भाग्य बनाना है!”*


*आज के लिए इतना ही काफी बाकी  बातें फिर कभी..........*


*राम राम जी*


*Astropawankv*

         *Let The Star's Guide You*


*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223. www.astropawankv.com*