*नवम भाव का स्वामी- दशम भाव में*
*भाग्येश दशमस्थे तु लोकवन्द्यो गुणी नरः।*
*भूपस्तत्सदृशोऽमात्यः सेनाध्यक्षोऽथवा भवेत् ।।*
*होरारत्न में कहा है कि नवमेश दशमस्थ हो तो मनुष्य गुणवान् लोकपूज्य राजा अथवा तत्सदृश मन्त्री या सेनाध्यक्ष होता है।*
*भाग्येश दशम भाव में हो तो जातक राजा का कार्य करने वाला, राजा से लाभ करने वाला, अच्छे कार्य में आसक्त, माता का अविघ्नकारी और प्रसिद्ध एवं धर्मिक होता है*
*नवमेश दशम में हो तो राजकीय मान सम्मान प्राप्ति व धुरन्धर राजकारणी*
*लोमेश संहिताः*
*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत् ।*
*पुण्यवान्पशुमांश्चापि साहसी क्रोधवर्जितः ।।*
*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम और चतुर्थ भाव में बैठा हो वह मनुष्य मन्त्री या सेनापति होता है। तथा पुण्यवान्, पशुओं को रखने वाला, साहसी और क्रोध से रहित होता है*
*पराशरः*
*भाग्येशे दशमे तुर्ये मन्त्री सेनापतिर्भवेत्।*
*पुण्यवान्सुयशो वाग्मी साहसी क्रोधवर्जितः।।*
*भाग्येश दशम या चतुर्थ भाव में हो तो जातक मंत्री वा सेनापति,. पुण्यवान्, यशस्वी, बुद्धिमान्, साहसी और क्रोध रहित होता है*
*मानसागरीः*
*नृपकर्माणं शूरं माता-पित्रोश्च पूजकं पुरुषम् ।*
*धर्मख्यातं कुरुते सुकृतपतिर्गगनगृहशीलः ।।*
*नवमेश दशम भाव में हो तो जातक राज कर्मचारी, शूर, माता-पिता का भक्त और धर्मात्मा होता है*
*यवन जातकः*
*नृपतिकर्मकरो नृपवित्तयुक्सुकृतकर्मकरो जननीपरः । विदितकर्मकरः सुकृताधिपो गगनगे पुरुषो भवति ध्रुवम् ॥*
*जिसके धर्मपति दशम भवन में हो वह पुरुष राजा का कर्म करनेवाला और राजा के धन से युक्त हो तथा श्रेष्ठ कर्म और माता की सेवा में तत्पर विख्यात कर्म करनेवाला होता है*
*भृगु संहिताः*
*धर्मनाथे गते कर्मे भातापित्रोश्च पूजकः ।*
*राजमानी प्रियामुक्तः राजद्वारा धनागमः ॥*
*जिसके जन्म काल में नवमेश दशम स्थान में हों वह मनुष्य माता और पिता की सेवा करने वाला, राजमानी, प्रिया से युक्त और राजद्वार से धन की प्राप्ति करने वाला होता है*
*जातक निर्णय*
*यदि नवमेश दशम भाव में हो तो जातक काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली होता है। वह उदार होगा और अधिकार वाले पद पर होगा। वह काफी धन अर्जित करेगा और हर प्रकार का आराम प्राप्त करेगा। उसके जीवन यापन का साधन उचित मार्ग होगा और वह कानून का पालन करने वाला नागरिक होगा*
*ज्योतिस्तत्त्वम् :*
*शेशे ऽन्वये सुकृतकर्मकरो नृपस्व-*
*भुग् भूपकर्मकरणोद्यत एप शूरः ।*
*सत्कीर्त्तिमान् सुविदितः पुरुषः सुशास्त्र-*
*विन्मातृवर्गविजयी पितृमातृभक्तः ॥*
*दशम में नवमेश होतो पुण्यकर्म करने वाला राजधन का उपभोग करने वाला, राजकार्य करने में उद्यत, शूरवीर उत्तम कीर्ति वाला, प्रसिद्ध, शास्त्र वेत्ता, मातृ वर्ग में विजय पाने वाला एवं माता पिता का भक्त होता है*
*मानाथभे मातृनिकेतने ऽथ वा मार्गाधिनाथे सुकृती च साहसी ।*
*क्रोधोज्झितः कीर्त्तियुतश्चमूपतिर्वाग्ग्मी प्रजातः सचिवः कलेवरी ॥*
*दशम वा चतुर्थ में नवमेश हो तो पुण्यात्मा, साहसी, क्रोध रहित, यशस्वी, सेनापति, शास्त्र सम्मत बोलने बाला एवं मंत्री होता है*
*नवाथेजी-यह भाग्यवान, कीर्तिमान, सफल, पुण्यकार्य करनेवाला तथा धर्मनिष्ठ होगा*
*हमारे विचार-उपर्युक्त फलों में बहुत भाई होना यह फल भाग्येश पापग्रह होकर पुरुष राशि में हो तो अनुभव में नहीं आता। अन्य फल शनि को छोड कर अन्य ग्रहों के बारे में ठीक प्रतीत होते हैं*
*नवम भाव हमारे भाग्य का भाव है अर्थात पुर्व जन्म कृत कर्मों का फल जो हमें इस जन्म में किए जा रहे कर्म में कुछ सहुलियत प्रदान करता है।*
*भाग्येश यहां कर्म क्षेत्र में बाधा भी उत्पन्न कर सकता है क्यों कि दशम में उसका द्वादशेष है।*
*नवमेश दशम में होगा तो वह योगकारी बन जाएगा क्योंकि त्रिकोण का स्वामी केंद्र में आ गया है।*
*और अपने भाव से द्वि द्वादश का सम्बन्ध बना लेगा।*
*अर्थात धन दायक तो होगा लेकिन व्ययकारक भी हो जाएगा।*
*एक हाथ ले एक हाथ दे।*
*भाग्य पती कर्म भाव में होगा तो वह लाभ के साथ साथ अवरोध भी पैदा कर देगा।*
*क्यों कि भाग्य से ज्यादा मिलना मुश्किल है।*
*अर्थात कर्म जितना मर्जी कर ले , लेकिन अगर भाग्य में ही नहीं लिखा तो कहां से मिल जाएगा।*
*इसलिए मानसिक*
*तनाव का कारण बन सकता है।*
*लेकिन भाग्य अनुकूल हुआ तो कम काम से भी अधिक लाभ मिल सकता है।*
*ग्रह की युति दृष्टि के कारण कुछ अधिक प्राप्त हो भी सकता है, लेकिन भाग्येश होने के कारण वह सब संचित जा भी सकता है।*
*इसीलिए यहां ज्यादा भाग्य के भरोसे न रह कर कर्म पर ही विश्वास रखना चाहिए।*
*क्यों कि यह भाव कालपुरूष की कुंडली में कर्म के स्वामी शनि का भाव है।*
*अतः इस भाव में भाग्य तभी चमकेगा जब कर्म के साथ साथ सात्विकता अर्थात धर्म परायणता हो,*
*चोरी चकारी अथवा गैर कानूनी कार्य न हो।*
*क्यों कि यह राज क्षेत्र है तो यहां गैरकानूनी ढंग से किए गए कार्य से राजदंड मिलना भी तय है।*
*और यहां का राजदंड देता है शनि , कर्म फल दाता शनि, और वह फल अपने दो चेलों राहु केतु के माध्यम से देगा।*
*अर्थात राहु केतु दंड देंगे और अन्य ग्रह उससे बचने के लिए या उसके अनुसार कर्म में लग जाएंगे।*
*मजे की बात यहां स्वयं शनि भी उनके द्वारा निर्धारित दंड को भोगेगा।*
*अर्थात यह सब ग्रह मिलकर जातक के उत्थान और पतन दोनों के लिए कार्य करेंगे।*
*बचेगा वही जो ग्रहानुसार कर्म करेगा।*
*मकर का मैदान है तो संघर्ष तो रहेगा ही रहेगा चाहे स्वयं ईश्वर ही क्यों न हों लीला रूप में ,जीव रूप में*
*नवमेश दशमस्थ हो तो ऐसा जातक कर्म स्थल पर बहुत ज्यादा धर्म पारायण हो सकता है।*
*लेकिन वह वैसी धर्म पारायणता स्वयं के लिए नहीं समझता।*
*वह कोई न कोई मार्ग अलग से जरूर निकाल लेगा ताकि धर्म पारायणता भी रह जाए और काम भी हो जाए।*
*उदाहरणार्थ*
*उदाहरण कुछ अलग हो सकता है फिर भी इससे भाव को समझा जा सकता है।*
*भगवान कृष्ण ने महाभारत में अर्जुन के हाथों कई योद्धाओं का अनैतिक तरीके से या नियमों की अवहेलना करते हुए वध करवा दिया।*
*जैसे भीष्म, कर्ण, भीम के हाथों दुर्योधन इत्यादि।*
*लेकिन वहीं बात अपने पर न आए उसके लिए धर्म पारायण तर्क भी रख दिया कि उन योद्धाओं ने कौन सा नियमों का पालन किया था।*
*कहने का तात्पर्य यह कि नवमेश दशमस्थ हो तो जातक अगर कोई अनैतिक कार्य*
*भी करता*
*है तो उसके पीछे नैतिक तर्क जरूर रख देगा।*
*लेकिन ऐसा नहीं है कि वह अनैतिक कर्म फल से भाग जाएगा या बच कर निकल जाएगा,*
*मकर राशि में उसके सारे कर्म रिकॉर्ड हो जाएंगे और उसे उसका भुगतान अगले जन्म में तो क्या इसी जन्म में भी करना होगा।*
*उसका वर्तमान का परिवार वर्तमान के सारे मिलने जुलने वाले उसके कर्म अनुसार या तो देकर जाएंगे नहीं तो लेकर तो जाएंगे ही।*
*आज कल भी प्रायः देखने को मिल ही जाता है, अनैतिक ढंग से कमाया धन , देर सवेर किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।*
*इसे आप कर्ज अदायगी या फर्ज अदायगी भी कह सकते हैं।*
*क्यों कि अग्नि त्रिकोण, धर्म त्रिकोण हमारी फर्ज अदायगी भी है।*
*वैदिक ज्योतिष में जब नवम भाव का स्वामी (भाग्येश) दशम भाव (कर्म भाव) में स्थित होता है, तो यह अत्यंत शुभ और शक्तिशाली राजयोग बनाता है, जिसे धर्म-कर्माधिपति राजयोग कहा जाता है मुख्य प्रभाव और फल कर्म ही भाग्य बनता है: नवम भाव भाग्य का है और दशम भाव कर्म का। जब भाग्य का स्वामी कर्म स्थान में जाता है, तो जातक की मेहनत और ईमानदारी ही उसके भाग्य का सबसे बड़ा निर्माण करती है। व्यक्ति जो काम करता है, वही उसकी पहचान और पूजा बन जाती है।*
*नवम भाव विदेश, यात्राओं और नए अनुभवों का भाव माना जाता है। जब इसका स्वामी दशम भाव में आता है, तब जातक को विदेश जाने का अवसर या दूर स्थानों पर काम करने के मौके मिलते हैं*
*ऐसे लोग अकसर विदेश में पढ़ाई, नौकरी या बिज़नेस के ज़रिए अपने करियर को नई ऊँचाई देते हैं। अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो यह योग व्यक्ति को ग्लोबल एक्सपोज़र, नए कॉन्टैक्ट्स और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिला सकता है*
*जब नवम भाव का स्वामी दशम भाव में आता है, तब यह स्थिति जीवन में कर्म और भाग्य का शक्तिशाली मेल बनाती है। ऐसे जातक अपने क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ते हैं फिर चाहे वह नौकरी हो, प्रशासनिक सेवा, राजनीति या स्वयं का व्यवसाय ,भाग्य यहाँ कर्म के साथ खड़ा रहता है, जिससे सफलता सहज और स्थायी बन जाती है।*
*यह योग अक्सर राजयोग तुल्य फल देता है — व्यक्ति को उच्च पद, प्रतिष्ठा और समाज में पहचान दिलाता है। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में “role model” की तरह माने जाते हैं, क्योंकि उनका जीवन यह संदेश देता है कि “भाग्य उन्हीं का साथ देता है, जो कर्म में आस्था रखते हैं*
*अगर ग्रह शुभ स्थिति में हो, तो जातक को सम्मान, पदोन्नति और लोक-मान्यता मिलती है। लेकिन अगर ग्रह अशुभ प्रभाव में हो, तो उन्नति में विलंब या बार-बार बाधाएँ आ सकती हैं। फिर भी, यह स्थिति इतना मजबूत संयोग है कि व्यक्ति अंततः अपने परिश्रम और आस्था से आगे निकल ही जाता है*
*काम और धर्म values का connection*
*ऐसा profession पसंद आता है जिसमें knowledge, advice, management, law, finance, teaching, administration या public dealing शामिल हो।*
*नवमेश दशम में हों तो व्यक्ति की अपने “काम”को ही अपनी पूजा-पाठ यानि अपना कर्म और धर्म बना लेना चाहिए फिर देखें किया बनता है।*
*“भाग्य भी career में ही लगाना है और career को ही अपना भाग्य बनाना है!”*
*आज के लिए इतना ही काफी बाकी बातें फिर कभी..........*
*राम राम जी*
*Astropawankv*
*Let The Star's Guide You*
*Scientific Astrology & Vastu Research Astrologer Pawan Kumar Verma (B.A.,D.P.I.,LL.B.) Astro. Research Centre Ludhiana Punjab Bharat Phone number 9417311379 , 7888477223. www.astropawankv.com*
